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अथर्ववेद के काण्ड - 8 के सूक्त 1 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 1/ मन्त्र 1
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - आयुः छन्दः - पुरोबृहती त्रिष्टुप् सूक्तम् - दीर्घायु सूक्त
    215

    अन्त॑काय मृ॒त्यवे॒ नमः॑ प्रा॒णा अ॑पा॒ना इ॒ह ते॑ रमन्ताम्। इ॒हायम॑स्तु॒ पुरु॑षः स॒हासु॑ना॒ सूर्य॑स्य भा॒गे अ॒मृत॑स्य लो॒के ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अन्त॑काय । मृ॒त्यवे॑ । नम॑: । प्रा॒णा: । अ॒पा॒ना: । इ॒ह । ते॒ । र॒म॒न्ता॒म् । इ॒ह । अ॒यम् । अ॒स्तु॒ । पुरु॑ष: । स॒ह । असु॑ना । सूर्य॑स्य ।भा॒गे । अ॒मृत॑स्य । लो॒के ॥१.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अन्तकाय मृत्यवे नमः प्राणा अपाना इह ते रमन्ताम्। इहायमस्तु पुरुषः सहासुना सूर्यस्य भागे अमृतस्य लोके ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अन्तकाय । मृत्यवे । नम: । प्राणा: । अपाना: । इह । ते । रमन्ताम् । इह । अयम् । अस्तु । पुरुष: । सह । असुना । सूर्यस्य ।भागे । अमृतस्य । लोके ॥१.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 8; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
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    हिन्दी (3)

    विषय

    मनुष्य कर्त्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (अन्तकाय) मनोहर करनेवाले [परमेश्वर] को (मृत्यवे) मृत्यु नाश करने के लिये (नमः) नमस्कार है, [हे मनुष्य !] (ते) तेरे (प्राणाः) प्राण और (अपानाः) अपान (इह) इस [परमेश्वर] में (रमन्ताम्) रमे रहें। (इह) इस [जगत्] में (अयम्) यह (पुरुषः) पुरुष (असुना सह) बुद्धि के साथ (सूर्यस्य) सब के चलानेवाले सूर्य [अर्थात् परमेश्वर] के (भागे) ऐश्वर्यसमूह के बीच (अमृतस्य लोके) अमरलोक [मोक्षपद] में (अस्तु) रहे ॥१॥

    भावार्थ

    जो मनुष्य अपने आत्मा को परमात्मा के गुणों में निरन्तर लगाते हैं, वे सर्वथा उन्नति करते हैं ॥१॥ सूर्य परमेश्वर का नाम है-यजु० ७।४२। (सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च) सूर्य चेतन और जड़ का आत्मा है ॥

    टिप्पणी

    १−(अन्तकाय) हसिमृग्रिण्वामिदमि०। उ० ३।८६। अम गत्यादिषु तन्। अन्तो मनोहरः। तत्करोतीत्युपसंख्यानम्। वा० पा० ३।१।२६। इति अन्त-णिच्-ण्वुल्। अन्तं करोति, अन्तयतीति अन्तकः। तस्मै मनोहरकर्त्रे परमेश्वराय (मृत्यवे) अ० ५।३०।१२। मृत्युं नाशयितुम् (प्राणाः) बहिर्मुखसंचारिणो वायवः (अपानाः) अवाङ्मुखसंचारिणो वायवः (इह) अस्मिन् परमात्मनि (ते) तव (रमन्ताम्) क्रीडन्तु (इह) अस्मिन् जगति (अयम्) निर्दिष्टः (अस्तु) भवतु (पुरुषः) मनुष्यः (सह) (असुना) प्रज्ञया-निघ० ३।९। (सूर्यस्य) सर्वप्रेरकस्य परमेश्वरस्य। सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च-यजु० ७।४२। इति प्रमाणम् (भागे) भज-अण्। ऐश्वर्याणां समूहे (अमृतस्य) मोक्षस्य (लोके) स्थाने ॥

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    विषय

    सूर्यस्य भागे

    पदार्थ

    १. (अन्तकाय) = [अन्तं करोति] सब प्राणियों का नाश करनेवाले, (मृत्यवे) = प्राणों के वियोजक मृत्यु के लिए (नमः) = नमस्कार हो। इस अन्तक की कोपदृष्टि से बचने के लिए हम उचित उपाय करें। हे आयुष्काम पुरुष। (ते) = तेरे (प्राणा: अपाना:) = बहिर्मुख संचारी तथा आवड्मुख संचारी वायुओं की वृत्तियाँ (इह रमन्ताम्) = इस शरीर में ही रमण करें। २. (अयम्) = यह प्राणसाधना करनेवाला (पुरुषः) = पुरुष (असुना सह) = प्राण के साथ (इह अस्तु) = इस शरीर में ही निवास करनेवाला हो, जोकि (सूर्यस्य भागे) = सूर्यकिरणों का सेवन करनेवाला है[भज सेवायाम्] अतएव (अमृतस्य लोके) = नीरोगता का स्थान है। जब तक यह शरीर सूर्यकिरणों के सम्पर्क में चलता है तब तक नौरोग बना रहता है-'उद्यन्नादित्यः क्रिमीन् हन्ति' उदय होता हुआ सूर्य रोग-कृमियों का विनाशक है।

    भावार्थ

    हम मृत्यु को दूर करने के लिए प्राणसाधना को अपनाएँ। हमारे शरीर में प्राणापानशक्ति बनी रहे। सूर्य-किरणों के सम्पर्क में रहकर हम शरीर को नीरोग रक्खें।

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    भाषार्थ

    (अन्तकाय मृत्यवे) अन्त करने वाले मृत्युनामक परमेश्वर के लिये (नमः) नमस्कार हो। [हे आयु की कामना वाले !] (ते) तेरे (प्राणाः अपानाः) प्राण और अपान (इह) इस तेरे शरीर में (रमन्ताम्) रमण करें। (अयम् पुरुषः) यह आयुष्काम पुरुष, (सह असुना) प्राणों के साथ वर्तमान हुआ, (सूर्यस्य भागे) सूर्य के सेवन के स्थान अर्थात् (अमृतस्य) शीघ्र न मरने के (इह लोके) इस लोक अर्थात् पृथिवी में (अस्तु) विद्यमान रहे।

    टिप्पणी

    [मन्त्र में तीन का वर्णन है; परमेश्वर का, आचार्य का, तथा आयुष्काम पुरुष का। कौशिक सूत्रों में माणवक के उपनयनकर्म में मन्त्र का विनियोग किया है। अथर्व० १३।४ (३) में परमेश्वर को "मृत्यु" कहा है। यथा स एव मृत्युः सोऽमृतं सोऽभ्वं सः रक्षः"। माणवक के दीर्घायुष्य के लिये परमेश्वर को नमस्कार किया है। साथ ही पुरुष पद द्वारा माणवक को सम्बोधित कर उसे कहा है कि तू ऐसे स्थान में वास कर जो कि सूर्य के प्रकाश वाला हो, प्रकाशरहित गृहों में निवास न कर। यथा "ता वां वास्तून्युष्मसि गमध्यै यव गावो भूरिशृङ्गा प्रयासः" (ऋ० १।१९४।६) "गावः भूरिशृङ्गाः" का अर्थ है बहुप्रकाशी सूर्यरश्मियां। शृङ्गाणि ज्वलतो नाम (निघं० १।१७)। गावः रश्मिनाम (निघं० १।५)। अमृत का लोक है पृथिवी। योगाङ्गों के अनुष्ठान से योगी पृथिवी में ही निवास करता हुआ अमृतत्व को, या अमृत परमेश्वर को प्राप्त कर मुक्तात्मा हो सकता है। भागे = भज सेवायाम्]।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Long Life

    Meaning

    Homage to the Immortal that rules the mortal in life and death. O man, let prana and apana energies abide here joyous strong for you in the body. Let this your spirit live on with pranic vitalities in this beautiful world of the Immortal and you enjoy your share of the life and refulgence of the sun.

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    Subject

    Ayuh

    Translation

    Homage be to death, that puts the end. May your outbreaths and in-breaths move on here with pleasure. May this man stay here full span of life, in the realm of the Sun, in the world of immortality.

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    Translation

    O man ! engineer all your best encounters against the death, the terminator, may your inward breaths: and outward breaths remain intact in your body, may this your soul with all consciousness and intelligence reside in your body and may you (after departing from the world) enjoy in the realm of All-impelling God which is world of bliss.

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    Translation

    Homage to God, the Ender of all through Death. May thy breathings, inward and outward still remain within Him. May this man, united with his intellect stay in this world, in the realm of God, and then in the world of life eternal.

    Footnote

    World of life eternal: Salvation. Surya means God, vide Yajur, 7-42.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(अन्तकाय) हसिमृग्रिण्वामिदमि०। उ० ३।८६। अम गत्यादिषु तन्। अन्तो मनोहरः। तत्करोतीत्युपसंख्यानम्। वा० पा० ३।१।२६। इति अन्त-णिच्-ण्वुल्। अन्तं करोति, अन्तयतीति अन्तकः। तस्मै मनोहरकर्त्रे परमेश्वराय (मृत्यवे) अ० ५।३०।१२। मृत्युं नाशयितुम् (प्राणाः) बहिर्मुखसंचारिणो वायवः (अपानाः) अवाङ्मुखसंचारिणो वायवः (इह) अस्मिन् परमात्मनि (ते) तव (रमन्ताम्) क्रीडन्तु (इह) अस्मिन् जगति (अयम्) निर्दिष्टः (अस्तु) भवतु (पुरुषः) मनुष्यः (सह) (असुना) प्रज्ञया-निघ० ३।९। (सूर्यस्य) सर्वप्रेरकस्य परमेश्वरस्य। सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च-यजु० ७।४२। इति प्रमाणम् (भागे) भज-अण्। ऐश्वर्याणां समूहे (अमृतस्य) मोक्षस्य (लोके) स्थाने ॥

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