अथर्ववेद के काण्ड - 8 के सूक्त 1 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 8/ सूक्त 1/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - ब्रह्मा देवता - आयुः छन्दः - पुरोबृहती त्रिष्टुप् सूक्तम् - दीर्घायु सूक्त
    पदार्थ -

    (अन्तकाय) मनोहर करनेवाले [परमेश्वर] को (मृत्यवे) मृत्यु नाश करने के लिये (नमः) नमस्कार है, [हे मनुष्य !] (ते) तेरे (प्राणाः) प्राण और (अपानाः) अपान (इह) इस [परमेश्वर] में (रमन्ताम्) रमे रहें। (इह) इस [जगत्] में (अयम्) यह (पुरुषः) पुरुष (असुना सह) बुद्धि के साथ (सूर्यस्य) सब के चलानेवाले सूर्य [अर्थात् परमेश्वर] के (भागे) ऐश्वर्यसमूह के बीच (अमृतस्य लोके) अमरलोक [मोक्षपद] में (अस्तु) रहे ॥१॥

    भावार्थ -

    जो मनुष्य अपने आत्मा को परमात्मा के गुणों में निरन्तर लगाते हैं, वे सर्वथा उन्नति करते हैं ॥१॥ सूर्य परमेश्वर का नाम है-यजु० ७।४२। (सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च) सूर्य चेतन और जड़ का आत्मा है ॥

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