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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 10/ मन्त्र 1
    ऋषिः - अथर्वाचार्यः देवता - विराट् छन्दः - चतुष्पदा विराडनुष्टुप् सूक्तम् - विराट् सूक्त
    69

    सोद॑क्राम॒त्सा वन॒स्पती॒नाग॑च्छ॒त्तां वन॒स्पत॑योऽघ्नत॒ सा सं॑वत्स॒रे सम॑भवत्।

    स्वर सहित पद पाठ

    सा । उत् । अ॒क्रा॒म॒त् । सा । वन॒स्पती॑न् । आ । अ॒ग॒च्छ॒त् । ताम् । वन॒स्पत॑य: । अ॒घ्न॒त॒ । सा । स॒म्ऽव॒त्स॒रे । सम् । अ॒भ॒व॒त् ॥१२.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    सोदक्रामत्सा वनस्पतीनागच्छत्तां वनस्पतयोऽघ्नत सा संवत्सरे समभवत्।

    स्वर रहित पद पाठ

    सा । उत् । अक्रामत् । सा । वनस्पतीन् । आ । अगच्छत् । ताम् । वनस्पतय: । अघ्नत । सा । सम्ऽवत्सरे । सम् । अभवत् ॥१२.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 8; सूक्त » 10; पर्यायः » 3; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    ब्रह्मविद्या का उपदेश।

    पदार्थ

    (सा उत् अक्रामत्) वह [विराट्] ऊपर चढ़ी, (सा) वह (वनस्पतीन्) वनस्पतियों [वृक्ष आदि पदार्थों] में (आ अगच्छत्) आयी, (ताम्) उसको (वनस्पतयः) वनस्पतियाँ (अघ्नत) प्राप्त हुईं, (सा) वह (संवत्सरे) संवत्सर [वर्ष काल] में (सम् अभवत्) संयुक्त हुई ॥१॥

    भावार्थ

    विराट्, ईश्वरशक्ति का प्रादुर्भाव वृक्ष आदि पदार्थों में हैं ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(वनस्पतीन्) वृक्षादिपदार्थान् (आ अगच्छत्) आगतवती (ताम्) विराजम् (वनस्पतयः) (अघ्नत) हन हिंसागत्योः। अघ्नन्। अगच्छन् (सा) (संवत्सरे) संवसन्ति ऋतवोऽत्र, सम्+वस-सरन्। द्वादशमासात्मके काले (सम् अभवत्) समगच्छत्। अन्यद्गतम् ॥

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    विषय

    वनस्पतियों का विराट् को प्राप्त होना

    पदार्थ

    १. (सा) = वह विराटप कामधेनु [विशिष्ट शासन-व्यवस्था] (उदक्रामत्) = उत्क्रान्त हुई। (सा वनस्पतीन् आगच्छत्) = वह वनस्पतियों को पास हुई, (वनस्पतय: तां अघ्नत) = वनस्पतियों ने उसे प्राप्त किया [हन् गती]। (सा) = वह (संवत्सरे) = सम्पूर्ण वर्ष में (समभवत्) = उन वनस्पतियों के साथ हुई-खूब अच्छी फसल हुई। (तस्मात्) = इस कारण से (वनस्पतीनाम्) = वनस्पतियों का (वृक्णम्) = छिन्न भाग (अपि) = भी (संवत्सरे) = वर्षभर में (रोहति) = प्रादुर्भूत हो जाता है। (यः एवं वेद) = जो इस तत्त्व को समझ लेता है कि 'वनस्पतियों का छिन्नभाग भी फिर ठीक हो जाता है, तो हमारा छिन्नभाग भी क्यों न ठीक हो जाएगा'(अस्य) = इसका (अप्रियः भ्रातृव्यः वृश्चते) = अप्रिय शत्रु भी कट जाता हैं।

    भावार्थ

    शासन-व्यवस्था के ठीक होने पर राष्ट्र में वृक्ण वृक्षों का रोहण होता है। जैसे वर्षभर में ये वृक्ष पुन: प्रादुर्भूत हो जाते हैं, इसी प्रकार इस राष्ट्र में लोग शत्रुओं से शत्रुता को भी समाप्त कर लेते हैं।

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    भाषार्थ

    (सा) वह विराट (उदक्रामत्) उत्क्रान्त हुई, समुन्नत हुई, (सा) वह (वनस्पतीन्) वनस्पतियों की ओर (आगच्छत्) आई, (ताम्) उसे (वनस्पतयः) वनस्पतियों ने (अघ्नत१) प्राप्त किया, (सा) वह (संवत्सरे) संवत्सर में (सम् अभवत्) प्रकट हुई। विराट् वनस्पतियों को प्राप्त हुई, और इस का प्रकट होना, संवत्सर में हुआ।

    टिप्पणी

    [१. अघ्नत= हन् हिंसागत्योः" (अदादिः), “हन्" का अर्थ “गति” अभिप्रेत है। गतेस्त्रयोऽर्थाः= ज्ञानम्, गतिः, प्राप्तिश्च। अतः अघ्नत= प्राप्त किया।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Virat

    Meaning

    Paryaya 3 Virat evolved further and ascended. It came into herbs and trees. The herbs and trees received it. It manifested in growth through the year.

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    Subject

    Virat

    Translation

    She moves up. She came to the forest-trees. The foresttrees smote her. In a year, she came into being (again).

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    Translation

    This Virat mounted up and this reached the trees. Trees wounded this virat. This restored the wound healed in a year.

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    Translation

    The glory of God manifested itself, and appeared in the shape of trees. They enjoyed her. She lived with them for a year.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(वनस्पतीन्) वृक्षादिपदार्थान् (आ अगच्छत्) आगतवती (ताम्) विराजम् (वनस्पतयः) (अघ्नत) हन हिंसागत्योः। अघ्नन्। अगच्छन् (सा) (संवत्सरे) संवसन्ति ऋतवोऽत्र, सम्+वस-सरन्। द्वादशमासात्मके काले (सम् अभवत्) समगच्छत्। अन्यद्गतम् ॥

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