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अथर्ववेद के काण्ड - 8 के सूक्त 10 के मन्त्र
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अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 10/ मन्त्र 4
ऋषिः - अथर्वाचार्यः
देवता - विराट्
छन्दः - आर्च्यनुष्टुप्
सूक्तम् - विराट् सूक्त
51
तामू॒र्जां दे॒वा उप॑ जीवन्त्युपजीव॒नीयो॑ भवति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥
स्वर सहित पद पाठताम् । ऊ॒र्जाम् । दे॒वा: । उप॑ । जी॒व॒न्ति॒ । उ॒प॒ऽजी॒व॒नीय॑: । भ॒व॒ति॒ । य: । ए॒वम् । वेद॑ ॥१४.४॥
स्वर रहित मन्त्र
तामूर्जां देवा उप जीवन्त्युपजीवनीयो भवति य एवं वेद ॥
स्वर रहित पद पाठताम् । ऊर्जाम् । देवा: । उप । जीवन्ति । उपऽजीवनीय: । भवति । य: । एवम् । वेद ॥१४.४॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थ
(देवाः) विजय चाहनेवाले पुरुष (ताम् ऊर्जाम्) उस बलवती का (उप जीवन्ति) सहारा लेकर जीते हैं, (उपजीवनीयः) वह [दूसरों का] आश्रय (भवति) होता है, (यः एवम् वेद) जो ऐसा जानता है ॥४॥
भावार्थ
ईश्वरमहिमा से मनुष्य विजय पाते हैं, ऐसा जाननेवाला पुरुष सदा उपकारी होता है ॥४॥
टिप्पणी
४−(उपजीवनीयः) अन्येषामाश्रयणीयः। अन्यत् पूर्ववत् ॥
विषय
देवों द्वारा 'ऊर्जा' का दोहन
पदार्थ
१. (सा उदक्रामत्) = वह विराट् उत्क्रान्त हुई। (सा देवान् आगच्छत्) = वह देवों को-ज्ञानी पुरुषों को प्राप्त हुई। (तां देवाः उपाह्वयन्त) = उसे देवों ने पुकारा कि (उर्जे एहि इति) = हे बल व प्राणशक्ते! आओ तो। (तस्या:) = उस विराट् का (वत्सः) = प्रिय यह देव (इन्द्रः) = इन्द्रियों का अधिष्ठाता [जितेन्द्रिय पुरुष] था। (चमस:) = ये सिर ही (पात्रम्) = रक्षासाधन हैं। देवलोग इस (चमस्) = शिरोभाग को ठीक रखने से ही अपने पर शासन करते हुए इन्द्रियों के दास व विषयासक्त नहीं होते। २. (ताम्) = उस विराट् को (देव:) = उस प्रकाशमय जीवनवाले (सविता) = अपने अन्दर सोम का सवन करनेवाले पुरुष ने (अधोक्) = दुहा । उत्तम शासन-व्यवस्था होने पर शान्त वातावरण में देववृत्ति के पुरुष अपने जीवन को विषय-प्रवण न बनाकर जितेन्द्रिय बनें और सोम-सम्पादन में प्रवृत्त हुए। (तां ऊर्जाम्) = उस बल व प्राणशक्ति को (देवा:) = देव (उपजीवन्ति) = अपना जीवन आधार बनाते है। (यः एवं वेद) = जो इसप्रकार ऊर्जा के महत्व को समझ लेता है वह (उपजीवनीयः भवति) = औरों के जीवन का भी आधार बनता है औरों का उपजीव्य होता है।
भावार्थ
राष्ट्र-व्यवस्था के शान्त होने पर जितेन्द्रिय देववृत्ति के पुरुष सोम का शरीर में रक्षण करते हुए 'बल व प्राणशक्ति' का दोहन करते हैं और अपने जीवन को उत्तम बनाते हुए औरों के लिए भी सहायक एवं मार्गदर्शक होते हैं।
भाषार्थ
इन्द्रादिदेवताकराज्य (आधिदैविकार्थ) —(ताम्, ऊर्जाम् उप) उस ऊर्जा के आश्रय (देवाः) देव (जीवन्ति) जीवित होते हैं (यः) जो (एवम्) इस प्रकार इस तथ्य को (वेद) जानता है, वह भी (उपजीवनीयः) आश्रितों के जीवनों का साधक (भवति) हो जाता है। वैश्यप्रकृतिक राज्य (आधिभौतिकार्थ) — देवाः= व्यापारी वैश्य (ताम्, ऊर्जाम्) उस अन्न के (उप) आश्रय (जीवन्ति) जीवित होते हैं, (यः) जो (एवम्) इस प्रकार [इस तथ्य को] (वेद) जानता है, वह (उपजीवनीयः) अन्यों के जीवनों का आश्रय (भवति) हो जाता है।
टिप्पणी
इन्द्रादिदेवताकराज्य (आधिदैविकार्थ) —[देवाः=प्राकृतिक देव। उप = उपाश्रित्य। प्राकृतिक देव = वायु, विद्युत्, वृक्ष, वनस्पति आदि, ये भी देव हैं। आधिदैविक देवों के स्वरूप-परिज्ञान के लिये देखो (यजु० १४।२०)]। वैश्यप्रकृतिक राज्य (आधिभौतिकार्थ) — [ऊर्जाम्, उप, जीवन्ति= ऊर्जाम्, उपाश्रित्य, जीवन्ति]।
विषय
विराड् रूप गौ से ऊर्जा, पुण्य गन्ध, तिरोधा और विष का दोहन।
भावार्थ
(सा उत् अक्रामत्) वह विराट् उठी, (सा देवान् आगच्छत्) वह देवों के पास आगई, (तां देवाः) उसको देवों ने (उर्जे एहि इति उप अह्वयन्त) ऊर्जे ! आओ इस प्रकार सादर बुलाया। (तस्याः इन्द्रः वत्सः आसीत्) उसका इन्द्र=विद्युत् वत्स था। और (चमसः पात्रम्) चमस पात्र था। (तां देवः सविता अधोक्) उसको देव सविता ने दुहा। (ताम् ऊर्जाम् एव अधोक्) उससे ऊर्ज तेजोमय वीर्य ही प्राप्त किया। (ताम् ऊर्जाम् देवाः उपजीवन्ति) उस ऊर्ज तेजोमय वीर्य पदार्थ पर देवगण जीवन धारण करते हैं। (यः एवं वेद) जो इस प्रकार का रहस्य जानता है वह (उपजीवनीयः भवति) देवों को भी जीवन देने में समर्थ होता है। देव प्राण हैं, इन्द्र आत्मा है, शिरोभाग चमसपात्र है। सविता मुख्य प्राण ने विराट् अन्न में से ऊर्ज, बल का दोहन किया। देव अर्थात् प्राण उसी ऊर्ज अर्थात् वीर्य से अनुप्राणित हैं। महाब्रह्माण्ड में दिव्य पदार्थ अग्नि आदि देव हैं, इन्द्र अर्थात् विद्युत् वत्स है। आकाश चमस पात्र है। उस ब्रह्ममयी विराट् शक्ति से सूर्य ने तेज प्राप्त किया उससे ही समस्त पदार्थ अनुप्राणित हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वाचार्य ऋषिः। विराट् देवता। १, १३ चतुष्पादे साम्नां जगत्यौ। १०,१४ साम्नां वृहत्यौ। १ साम्नी उष्णिक्। ४, १६ आर्च्याऽनुष्टुभौ। ९ उष्णिक्। ८ आर्ची त्रिष्टुप्। २ साम्नी उष्णिक्। ७, ११ विराड्गायत्र्यौ। ५ चतुष्पदा प्राजापत्या जगती। ६ साम्नां बृहती त्रिष्टुप्। १५ साम्नी अनुष्टुप्। षोडशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Virat
Meaning
Devas, all cosmic divinities of nature, and of humanity too, live by that cosmic energy. One who knows thus and bears energy becomes a life support for all others.
Translation
On that vigour the enlightened ones subsist: He, who knows it thus, becomes worthy of subsistence (on vigour).
Translation
The physical forces depend on the atomic energy for their operation and he who knows this becomes a fit supporter.
Translation
The aspirants for victory depend for life upon that Vigor. He who knows this secret becomes the supporter of others.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
४−(उपजीवनीयः) अन्येषामाश्रयणीयः। अन्यत् पूर्ववत् ॥
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