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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 10/ मन्त्र 6
    ऋषिः - अथर्वाचार्यः देवता - विराट् छन्दः - साम्नी त्रिष्टुप् सूक्तम् - विराट् सूक्त
    52

    तस्या॑श्चि॒त्रर॑थः सौर्यवर्च॒सो व॒त्स आसी॑त्पुष्करप॒र्णं पात्र॑म्।

    स्वर सहित पद पाठ

    तस्या॑: । चि॒त्रऽर॑थ: । सौ॒र्य॒ऽव॒र्च॒स: । व॒त्स: । आसी॑त् । पु॒ष्क॒र॒ऽप॒र्णम् । पात्र॑म् ॥१४.६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तस्याश्चित्ररथः सौर्यवर्चसो वत्स आसीत्पुष्करपर्णं पात्रम्।

    स्वर रहित पद पाठ

    तस्या: । चित्रऽरथ: । सौर्यऽवर्चस: । वत्स: । आसीत् । पुष्करऽपर्णम् । पात्रम् ॥१४.६॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 8; सूक्त » 10; पर्यायः » 5; मन्त्र » 6
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    ब्रह्मविद्या का उपदेश।

    पदार्थ

    (सौर्यवर्चसः) सूर्य का प्रकाश जाननेवाला (चित्ररथः) विचित्र रमणीय गुणोंवाला [जीव] (तस्याः) उसका (वत्सः) उपदेष्टा और (पुष्करपर्णम्) पुष्टि का पूर्ण करनेवाला ब्रह्म (पात्रम्) रक्षासाधन (आसीत्) था ॥६॥

    भावार्थ

    सूर्य आदि लोकों की विद्या जाननेवाला पुरुष परमेश्वरशक्ति का व्याख्यान करता है ॥६॥

    टिप्पणी

    ६−(चित्ररथः) विचित्ररमणीयगुणो जीवः (सौर्यवर्चसः) तदधीते तद्वेद। पा० ४।२।५६। सूर्यवर्चस्-अण्। सूर्यस्य प्रकाशवेत्ता (पुष्करपर्णम्) पुषः कित्। उ० ४।४। पुष पोषणे-करन्। धापॄवस्यज्यतिभ्यो नः। उ० ३।६। पॄ पालनपूरणयोः-न। पुष्टिपूरकं ब्रह्म। अन्यत् पूर्ववत् ॥

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    विषय

    ब्राह्मण व क्षत्रिय द्वारा पुण्यगन्ध' का दोहन

    पदार्थ

    १. (सा उदक्रामत्) = वह विराट् उत्क्रान्त हुई। (सा) = वह (गन्धर्वाप्सरसः) = ज्ञान की वाणी को धारण करनेवाले ब्राह्मणों के पास तथा [आप: नरसूनवः] प्रजाओं में विचरनेवाले [स गतौ] क्षत्रियों के पास (आगच्छत्) = आई। (ताम्) = उसे (गन्धर्वाप्सरस:) = ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों ने (उपाह्वयन्त) = पकारा कि (पुण्यगन्धे एहि इति) = पवित्र ज्ञान [पुण्य] के साथ सम्बन्धवाली[गन्ध-सम्बन्धे] आओ तो। (तस्या:) = उसका (वत्स:) = प्रिय (चित्ररथ:) = अद्भुत शरीर-रथवाला अथवा [चित् ज्ञाने] ज्ञानयुक्त शरीर-रथवाला (सौर्यवर्चस:) = सूर्य के समान वर्चस्वाला (आसीत्) = था। (पात्रम्) = उसका यह रक्षणीय शरीर (पुष्करपर्णम्) = [पुष् कर, प पालनपूरणयोः] पोषण करनेवाला तथा पालन व पूरण में प्रवृत्त था। २. (ताम्) = उस विराट् को (वसुरुचि:) = शरीर में उत्तम निवास के द्वारा दीस होनेवाले (सौर्यवर्चस:) = सूर्यसम वर्चस्वाले ने (अधोक्) = दुहा। इस 'वसुरुचि सौर्यवर्चस्' ने (ताम्) = उस विराट् से (पुण्यं एव गन्धम्) = पवित्र ज्ञान के साथ सम्बन्ध को ही (अधोक्) = दुहा। ये (गन्धर्वाप्सरस:) = ज्ञान की वाणी को धारण करनेवाले और प्रजाओं में विचरनेवाले क्षत्रिय (तम्) = उस (पुण्यगन्धं उपजीवन्ती) = पवित्र ज्ञान के साथ सम्बन्ध को ही जीवनाधार बनाते हैं। (यः एवं वेद) = जो इसप्रकार 'पुण्यगन्ध' के महत्त्व को समझ लेते हैं, वे (पुण्यगन्धि:) = इस पवित्र ज्ञान के साथ सम्बन्धवाले (उपजीवनीय:) = औरों के लिए जीवन में सहायक (भवति) = होते हैं।

    भावार्थ

    उत्तम शासन-व्यवस्था होने पर ब्राह्मण व क्षत्रिय 'पवित्र ज्ञान के साथ सम्बन्ध' प्राप्त करने के लिए यनशील होते हैं। इससे वे शरीर में उत्तम ज्ञान व निवास से दीस व सूर्यसम वर्चस्वाले होकर उत्तम जीवन प्राप्त करते हैं और औरों के लिए भी सहायक होते हैं।

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    भाषार्थ

    गन्धर्वाप्सरस राज्य (आधिदैविकार्थ)(सौर्यवर्चसः) सूर्य की दीप्ति से उत्पन्न (चित्ररथः) चित्र-विचित्र और रमणीय गति करने वाला मेघ (तस्याः) उस विराट-गौ का (वत्सः) बछड़ा (आसीत्) था, और (पुष्करपर्णम्) कमलपत्र (पात्रम्) रक्षा और पालन का साधन था। गन्धर्वाप्सरस राज्य (आधिभौतिकार्थ)(तस्याः) उस विराट-व्यवस्थारूपी गौ का (वत्सः) बछड़ा (आसीत्) था (सौर्यवर्चसः) सूर्यसदृशवर्चस्वी (चित्ररथः) चित्रित अर्थात् शस्त्रास्त्रों द्वारा सुसज्जित रथों वाला सैन्यवर्ग। (पुष्करपर्णम्) विकसित पंखुड़ियों वाला कमल था (पात्रम्) रक्षा और पालन का साधन।

    टिप्पणी

    गन्धर्वाप्सरस राज्य (आधिदैविकार्थ) —[चित्ररथः= मेघ। वर्षाऋतु में मेघ नानाकृतियों में दृष्टिगोचर होता, और मेघीय विद्युत, तथा इन्द्रधनुष द्वारा चित्रित होता है। यह नानाविध गतियों में अन्तरिक्ष में विचरता है। रथः "रहतेगितकर्मणः" (निरुक्त ९।२।११) तथा अन्तरिक्षीय इन्द्र [विद्युत्] इस मेघ-रथ में स्थित हुआ और चमकता हुआ अन्तरिक्ष के पक्षों में गति करता है। रथः "रममाणोऽस्मिस्तिष्ठतीति वा" (निरुक्त ९।२।१२)। सौर्यवर्चसः = मेघ, सूर्य के वर्चस् अर्थात् दीप्ति से उत्पन्न होता है। सूर्य की दीप्ति है, सूर्य की रश्मियां। यद्यपि मेघ की उत्पत्ति में अन्य भी कारण हैं, अग्नि आदि (मन्त्र ५), परन्तु मेघ की उत्पत्ति के मुख्य कारण हैं, सूर्य और उसकी रश्मियां। इसलिये चित्ररथ अर्थात् मेघ की उत्पत्ति में सूर्य और रश्मियों को विशेषरूप से कारण कहा है। पुण्यगन्धे (मन्त्र ५)। विराट् व्यवस्था रूप है, जिस व्यवस्था के अनुसार पुष्कर अर्थात् कमल उत्पन्न होते और विकसित होते हैं। इन पुष्करों के पराग आदि से जो सुगन्ध आती है उसे पुण्यगन्धा कहा है। यह सुगन्ध है, दुर्गन्ध नहीं। अतः इसे पुण्य अर्थात् पवित्र कहा है। विराट-व्यवस्था को मन्त्रों में गोरूप में भी दर्शाया है, क्योंकि इस से दोहा भी जाता है यथा "अधोक"। चित्ररथ अर्थात् मेघ बछड़ा बन कर विराट-गौ से जल का दोहन करता है, जिस से वर्षा होती, और "पुष्करपर्ण" आदि पैदा होते हैं। पर्ण का अभिप्राय है पुष्कर की पंखुड़ियां। एकवचन जात्येकवचन है। इन द्वारा पुष्करों का विकसितरूप दर्शाया है। ये विकसित-पुष्कर भ्रमरों, मधुकरों के पात्र हैं, रक्षक-और-पालक हैं। इन के साथ सूर्य का भी वर्णन हुआ है, सूर्य के होते ही पुष्कर विकसित होते हैं, और सूर्यास्त पर मुकुलित हो जाते हैं। इस प्रकार इन मन्त्रों में नानागूढ अर्थ विद्यमान हैं]। गन्धर्वाप्सरस राज्य (आधिभौतिकार्थ) —[चित्ररथः१= चित्राः रथाः यस्य सः; सैन्यवर्गः। अर्थात् जिस सैन्यवर्ग के रथ शस्त्रास्त्रों तथा पुष्पमालाओं आदि द्वारा सुसज्जित हैं। इस सैन्यवर्ग को विराट-व्यवस्थारूपी गौ का वत्स कहा है तथा इस चित्ररथ की रक्षा और पालन [पात्रम्] का साधन था विकसित कमल। अभिप्राय यह कि यह राज्य और सैन्यवर्ग है तो शस्त्रास्त्रों द्वारा सुसज्जित, ताकि कोई अन्य राष्ट्र इस पर आक्रमण करने का दुःसाहस न कर सके परन्तुः यह "गन्धर्वाप्सरस" राज्य है विकसित-कमलों आदि प्राकृतिक-विभूतियों को चाहने वाला, यह प्राकृतिक विभूतियों को निज रक्षक तथा पालक समझता है।] [१. चित्ररथ अर्थात् सैन्यवर्ग था बछड़ा भौर वसुरुचि अर्थात् बसु में रुचि वाला वैश्य था दोग्धा। बछड़े की सहायता द्वारा दोग्धा दूध दोहन कर सकता है। अभिप्राय यह कि सैन्यवर्ग द्वारा राज्य में शान्ति का वातावरण होने पर ही वैश्य, व्यापार द्वारा, विराट-व्यवस्था से धन-सम्पत् दोह सकता है।]

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    विषय

    विराड् रूप गौ से ऊर्जा, पुण्य गन्ध, तिरोधा और विष का दोहन।

    भावार्थ

    (सा उत् अक्रामत्) वह विराट् ऊपर उठी (सा गन्धर्वाप्सरसः) वह गन्धर्व अप्सराओं के पास (आगच्छत्) आई। (ताम्) उसको (गन्धर्वाप्सरसः) गन्धर्व और अप्सरा गण ने (पुण्यगन्धे एहि इति उपाह्वयन्त) ‘हे पुण्यगन्धे ! आओ’ इस प्रकार सादर बुलाया। (तस्याः) उसका (सौर्यवर्चसः) सूर्य के समान कान्तिमान् (चित्ररथः) चित्ररथ (वत्सः आसीत्) वत्स था। (पुष्करपर्ण) ‘पुष्कर पर्ण’ (पात्रम्) पात्र था। (ताम्) उसको (सौर्यवर्चसः वसुरुचिः) सूर्य के तेज से तेजस्वी वसुरुचि ने (अधोक्) दोहन किया (ताम् पुण्यसेव गन्धम् अधोक्) उससे पुण्य गन्ध को ही प्राप्त किया। (तं पुण्यं गन्धम्) उस पुण्य गन्ध से (गन्धर्वाप्सरसः उपजीवन्ति) गन्धर्व और अप्सरा गण जीवन धारण कर रहे हैं। (यः एवं वेद) जो इस प्रकार रहस्य को जानता है वह (पुण्यगन्धिः उपजीवनीयो भवति) स्वयं पुण्य गन्धवाला और उनको जीवन देने में समर्थ हो जाता है। वरुण आदित्यो राजा इत्याह। तस्य गन्धर्वा विशः, त इम आसते। इति युवानः शोभनाः उपसमेता भवन्ति। तान् उपदिशति आथर्वणो वेदः। श० १३। ४। २। ७ “सोमो वैष्णवो राजेत्याह। तस्याप्सरसो विशः। त इम आसते। इति युवतयः शोभनाः उपसमेता भवन्ति। ता उपदिशति आंगिरसो वेदः”। श० १३। ४। ३। ८॥ अर्थात् देश के युवक पुरुष ही ‘गन्धर्व’ हैं और नवयुवतियां ‘अप्सरा’ कहाती हैं। सूर्यवर्चस तेजस्वी चित्ररथ यह शरीर है। प्राणों को तृप्त करनेहारे आत्मा ने उस पुण्य गन्धर्व को दोहन किया। वह युवा युवतियों में ही विद्यमान होता है जिससे दाम्पत्य-आकर्षण होता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वाचार्य ऋषिः। विराट् देवता। १, १३ चतुष्पादे साम्नां जगत्यौ। १०,१४ साम्नां वृहत्यौ। १ साम्नी उष्णिक्। ४, १६ आर्च्याऽनुष्टुभौ। ९ उष्णिक्। ८ आर्ची त्रिष्टुप्। २ साम्नी उष्णिक्। ७, ११ विराड्गायत्र्यौ। ५ चतुष्पदा प्राजापत्या जगती। ६ साम्नां बृहती त्रिष्टुप्। १५ साम्नी अनुष्टुप्। षोडशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Virat

    Meaning

    Of Virat, Chitra-ratha, wondrous light of various radiation bearing the glory of the sun, was the baby calf and the flower and the leaf the bowl.

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    Translation

    Citrarathe (one having a wonderful chariot), son of Suryavarcas (brilliant as the Sun), was her calf; a: lotusleaf (puskara-parna) was the milking-pot. (Saurya-varcaso vatsa).

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    Translation

    Chitraratha, the electricity of this name which gets its vigor from the sun was its calf and the space was milking pan.

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    Translation

    The multi-merited soul who knows the brilliance of the Sun was her preacher, and All-invigorating God, the Guardian.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ६−(चित्ररथः) विचित्ररमणीयगुणो जीवः (सौर्यवर्चसः) तदधीते तद्वेद। पा० ४।२।५६। सूर्यवर्चस्-अण्। सूर्यस्य प्रकाशवेत्ता (पुष्करपर्णम्) पुषः कित्। उ० ४।४। पुष पोषणे-करन्। धापॄवस्यज्यतिभ्यो नः। उ० ३।६। पॄ पालनपूरणयोः-न। पुष्टिपूरकं ब्रह्म। अन्यत् पूर्ववत् ॥

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