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  • अथर्ववेद - काण्ड 8/ सूक्त 10/ मन्त्र 3
    ऋषि: - अथर्वाचार्यः देवता - विराट् छन्दः - द्विपदा प्राजापत्यानुष्टुप् सूक्तम् - विराट् सूक्त
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    यत्प्र॑त्या॒हन्ति॑ वि॒षमे॒व तत्प्र॒त्याह॑न्ति ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यत् । प्र॒ति॒ऽआ॒हन्ति॑ । वि॒षम् । ए॒व । तत् । प्र॒ति॒ऽआह॑न्ति ॥१५.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यत्प्रत्याहन्ति विषमेव तत्प्रत्याहन्ति ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यत् । प्रतिऽआहन्ति । विषम् । एव । तत् । प्रतिऽआहन्ति ॥१५.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 8; सूक्त » 10; पर्यायः » 6; मन्त्र » 3
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    पदार्थ -
    [तब] (यत्) नियन्ता [ब्रह्म] (विषम्) विष को (एव) इस प्रकार (प्रत्याहन्ति) हटा देता है, (तत्) विस्तार करनेवाला [ब्रह्म] (प्रत्याहन्ति) हटा देता है ॥३॥

    भावार्थ - जब मनुष्य विचारपूर्वक दोष हटाने का प्रयत्न करता है, ब्रह्म की कृपा से उसके सब दोष क्षीण हो जाते हैं ॥३॥


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    Meaning -
    Whoever counters and destroys the purveyor of poison, counters and destroys the poison itself.


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