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अथर्ववेद के काण्ड - 8 के सूक्त 5 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 18
    ऋषिः - शुक्रः देवता - कृत्यादूषणम् अथवा मन्त्रोक्ताः छन्दः - चतुष्पदा भुरिग्जगती सूक्तम् - प्रतिसरमणि सूक्त
    55

    वर्म॑ मे॒ द्यावा॑पृथि॒वी वर्माह॒र्वर्म॒ सूर्यः॑। वर्म॑ म॒ इन्द्र॑श्चा॒ग्निश्च॒ वर्म॑ धा॒ता द॑धातु मे ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    वर्म॑ । मे॒ । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । वर्म॑ । अह॑:। वर्म॑ । सूर्य॑: । वर्म॑ । मे॒ । इन्द्र॑: । च॒ । अ॒ग्नि: । च॒ । वर्म॑ । धा॒ता । द॒धा॒तु॒ । मे॒ ॥५.१८॥


    स्वर रहित मन्त्र

    वर्म मे द्यावापृथिवी वर्माहर्वर्म सूर्यः। वर्म म इन्द्रश्चाग्निश्च वर्म धाता दधातु मे ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    वर्म । मे । द्यावापृथिवी इति । वर्म । अह:। वर्म । सूर्य: । वर्म । मे । इन्द्र: । च । अग्नि: । च । वर्म । धाता । दधातु । मे ॥५.१८॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 8; सूक्त » 5; मन्त्र » 18
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    हिंसा के नाश का उपदेश।

    पदार्थ

    (मे) मेरे लिये (द्यावापृथिवी) आकाश और भूमि (वर्म) कवच, (अहः) दिन (वर्म) कवच, (सूर्यः) सूर्य (वर्म) कवच (मे) मेरे लिये (इन्द्रः) वायु (च) और (अग्निः) अग्नि [जाठर अग्नि] (च) भी (वर्म) कवच [होवे], (धाता) पोषण करनेवाला परमेश्वर (मे) मेरे लिये (वर्म) कवच (दधातु) धारण करे ॥१८॥

    भावार्थ

    मनुष्य परमेश्वर की महिमा को विचार कर संसार के सब पदार्थों से उपकार लेकर सदा उन्नति करे ॥१८॥ इस मन्त्र का पूर्वार्द्ध-अ० १९।२–०।४। में भी है ॥

    टिप्पणी

    १८−(वर्म) कवचम्। रक्षासाधनं भवतु (मे) मह्यम् (द्यावापृथिवी) आकाशभूमी (अहः) दिनम् (सूर्यः) आदित्यः (इन्द्रः) वायुः (च) (अग्निः) जाठराग्निः (च) अपि (धाता) पोषकः परमेश्वरः (दधातु) धारयतु। अन्यद्गतम् ॥

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    विषय

    इन्द्र, अग्नि व धाता

    पदार्थ

    १. (द्यावापृथिवी) = धुलोक व पृथिवीलोक-मस्तिष्क व शरीर (मे) = मेरे लिए (वर्म) = कवच को (दधातु) = धारण कराएँ। (अहः) = दिन [अ-हन्] समय को नष्ट न करने की वृत्ति (वर्म) = कवच को धारण कराए। (सूर्य:) = ज्ञान का सूर्य (वर्म) = कवच को धारण कराए। वीर्यमणि ही कवच है। इस कवच को धारण करनेवाला मस्तिष्करूप धुलोक को दीप्स बनाता है, शरीररूप पृथिवीलोक को दृढ़ बनता है। इस कवच को धारण करनेवाला सारे दिन उत्तम कार्यों में प्रवृत्त रहता है और अपने जीवन में ज्ञानसूर्य को उदित करता है। २. (मे) = मेरे लिए (इन्द्रः च अग्निः च) = इन्द्र और अग्नि (वर्म) = इस कवच को धारण कराएँ। जितेन्द्रिय व आगे बढ़ने की भावनावाला बनकर मैं इस बीर्य को अपने में सुरक्षित करूँ।(धाता) = वह धारक प्रभु (मे) = मुझे (वर्म) = वीर्यमणिरूप कवच धारण कराए। धारणात्मक कर्मों में लगा हुआ मैं इस वीर्यमणि को अपने में सुरक्षित करनेवाला बनूँ |

    भावार्थ

    वीर्य को अपने अन्दर वह धारण कर पाता है जो अपने मस्तिष्क व शरीर को दोस व दृढ़ बनाने का निश्चय करता है [द्यावापृथिवी], जो दिन में एक-एक क्षण को यज्ञादि उत्तम कर्मों में बिताता है [अहः], अपने अन्दर ज्ञानसूर्य को उदित करने के लिए यनशील होता है [सूर्यः] । यह जितेन्द्रिय [इन्द्र],आगे बढ़ने की वृत्तिवाला [अग्नि], धारणात्मक कर्मों में प्रवृत्त व्यक्ति [धाता] ही इस वीर्य को अपना कवच बना पाता है।

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    भाषार्थ

    (द्यावापृथिवी) द्युलोक और पृथिवीलोक (मे) मेरे के लिये (वर्म) कवच हों, (अहः) दिन (वर्म) कवच हो, (सूर्यः) सूर्य (वर्म) कवच हो, (इन्द्रः च) विद्युत् (अग्निः च) और अग्नि (वर्म) कवच हो, (धाता) विधाता परमेश्वर (मे) मेरे लिये (वर्म) अपने आप को कवचरूप में स्थापित करे।

    टिप्पणी

    [मानुष-सपत्नों का प्रभाव हो जाने पर [मन्त्र ७] सम्राट्, प्राकृतिक शक्तियों और विधाता अपने कवचरूप में स्थापित करने की प्रार्थना विधाता से करता है]।

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    विषय

    शत्रुनाशक सेनापति की नियुक्ति।

    भावार्थ

    (द्यावापृथिवी) द्यु, आकाश और पृथिवी (मे वर्म दधातु) मेरे लिये आपत्तियों को वारण करने वाला कवच या रक्षासाधन प्रदान करें। (अहः वर्म) दिन का प्रकाशमय काल मुझे आपत्तियों से बचने का उपाय प्रदान करे। (सूर्यः वर्म दधातु) सूर्य, तेजःपुञ्ज अपने प्रखर तेज से मुझे रोगों से बचने का साधन दे। (इन्द्रः च वर्म) इन्द्र, विद्युत् या राजा मुझे वर्म अर्थात् ऐसा साधन दे और (अग्निः च वर्म) अग्नि और अग्रणी, नेता, सेनापति मुझे रक्षा साधन दे और (धाता वर्म दधातु) सबका पालक पोषक परमात्मा मुझे सब विपत्तियों से बचने का प्रबल साधन प्रदान करे।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    शुक्र ऋषिः। कृत्यादूषणमुत मन्त्रोक्ता देवताः। १, ६, उपरिष्टाद् बृहती। २ त्रिपाद विराड् गायत्री। ३ चतुष्पाद् भुरिग् जगती। ७, ८ ककुम्मत्यौ। ५ संस्तारपंक्तिर्भुरिक्। ९ पुरस्कृतिर्जगती। १० त्रिष्टुप्। २१ विराटत्रिष्टुप्। ११ पथ्या पंक्तिः। १२, १३, १६-१८ अनुष्टुप्। १४ त्र्यवसाना षट्पदा जगती। १५ पुरस्ताद बृहती। १३ जगतीगर्भा त्रिष्टुप्। २० विराड् गर्भा आस्तारपंक्तिः। २२ त्र्यवसाना सप्तपदा विराड् गर्भा भुरिक् शक्वरी। द्वाविंशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Pratisara Mani

    Meaning

    May the heaven and earth bear and bring me the armour of defence, may the sun and day bear and bring me the armour of defence, may Indra and Agni, cosmic energy and earthly fire bear and bring me the armour of defence, and may Dhata, lord sustainer of the universe bear the defence and bless me with all round safety and peace against all sin and violence, external and internal.

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    Translation

    May the heaven and earth be an armour for me; an armour the day, an armour the Sun. May the resplendent Lord and the adorable Lord be an armour for me. May the sustainer (dhata) put an armour on me.

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    Translation

    Let the heaven and earth give us armor of safety, let the day grant us armor of safety, let the sun grant us the armor of safety, let the air grant me the armor of safety, let the fire grant me the armor of safety and may All-supporting Divinity grant us the armor of safety.

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    Translation

    May Heaven and Earth serve as my armour against calamities, may Day and Sun be my coat of mail against diseases, may Air and Fire protect me, may God preserve me from misfortunes.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १८−(वर्म) कवचम्। रक्षासाधनं भवतु (मे) मह्यम् (द्यावापृथिवी) आकाशभूमी (अहः) दिनम् (सूर्यः) आदित्यः (इन्द्रः) वायुः (च) (अग्निः) जाठराग्निः (च) अपि (धाता) पोषकः परमेश्वरः (दधातु) धारयतु। अन्यद्गतम् ॥

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