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अथर्ववेद के काण्ड - 8 के सूक्त 5 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 22
    ऋषिः - शुक्रः देवता - कृत्यादूषणम् अथवा मन्त्रोक्ताः छन्दः - त्र्यवसाना सप्तदा विराड्गर्भा भुरिक्शक्वरी सूक्तम् - प्रतिसरमणि सूक्त
    72

    स्व॑स्ति॒दा वि॒शां पति॑र्वृत्र॒हा वि॑मृ॒धो व॒शी। इन्द्रो॑ बध्नातु ते म॒णिं जि॑गी॒वाँ अप॑राजितः। सो॑म॒पा अ॑भयङ्क॒रो वृषा॑। स त्वा॑ रक्षतु स॒र्वतो॒ दिवा॒ नक्तं॑ च वि॒श्वतः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    स्व॒स्ति॒ऽदा: । वि॒शाम् । पति॑: । वृ॒त्र॒ऽहा । वि॒ऽमृ॒ध: । व॒शी । इन्द्र॑: । ब॒ध्ना॒तु॒ । ते॒ । म॒णिम् । जि॒गी॒वान् । अप॑राऽजित: । सो॒म॒ऽपा: । अ॒भ॒य॒म्ऽक॒र: । वृषा॑ । स: । त्वा॒ । र॒क्ष॒तु॒ । स॒र्वत॑: । दिवा॑ । नक्त॑म् । च॒ । वि॒श्वत॑: ॥५.२२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    स्वस्तिदा विशां पतिर्वृत्रहा विमृधो वशी। इन्द्रो बध्नातु ते मणिं जिगीवाँ अपराजितः। सोमपा अभयङ्करो वृषा। स त्वा रक्षतु सर्वतो दिवा नक्तं च विश्वतः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    स्वस्तिऽदा: । विशाम् । पति: । वृत्रऽहा । विऽमृध: । वशी । इन्द्र: । बध्नातु । ते । मणिम् । जिगीवान् । अपराऽजित: । सोमऽपा: । अभयम्ऽकर: । वृषा । स: । त्वा । रक्षतु । सर्वत: । दिवा । नक्तम् । च । विश्वत: ॥५.२२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 8; सूक्त » 5; मन्त्र » 22
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    हिंसा के नाश का उपदेश।

    पदार्थ

    (स्वस्तिदाः) मङ्गल का देनेहारा, (विशाम्) प्रजाओं का (पतिः) पालनेहारा, (वृत्रहा) अन्धकार मिटानेहारा, (विमृधः) शत्रुओं को (वशी) वश में करनेहारा, (जिगीवान्) विजयी, (अपराजितः) कभी न हराया गया, (सोमपाः) ऐश्वर्य की रक्षा करनेहारा, (अभयङ्करः) अभय करनेहारा, (वृषा) महाबली (इन्द्रः) बड़े ऐश्वर्यवाला जगदीश्वर (ते) तुझको [हे मनुष्य !] (मणिम्) मणि [श्रेष्ठ नियम] (बध्नातु) बाँधे। (सः) वह (सर्वतः) सब प्रकार (दिवा नक्तं च) दिन और रात (विश्वतः) सब ओर से (त्वा) तेरी (रक्षतु) रक्षा करे ॥२२॥

    भावार्थ

    मनुष्य परमेश्वर की उपासना करके उत्तम नियमों का पालन कर सदा सुरक्षित रहें ॥२२॥ इस मन्त्र का प्रथम भाग और कुछ अन्यपद आ चुके हैं-अ० १।२१।१ ॥

    टिप्पणी

    २२-अस्य मन्त्रस्य। बहवः पदार्थाः साधिताः-अ० १।२१।१। अत्र तेषां पर्य्यायवाचिनो दीयन्ते (स्वस्तिदाः) क्षेमप्रदः (विशां पतिः) प्रजानां पालकः (वृत्रहा) अन्धकारनाशकः (विमृधः) शत्रून् (वशी) वशयिता (इन्द्रः) परमेश्वरः (बध्नातु) धारयतु (ते) तुभ्यम् (मणिम्) म० १। श्रेष्ठनियमम् (जिगीवान्) अ० ४।२२।६। जयशीलः (अपराजितः) अनभिभूतः (सोमपाः) ऐश्वर्यरक्षकः (अभयङ्करः) अभयप्रदः (वृषा) महाबली (सः) इन्द्रः (त्वा) त्वाम् (रक्षतु) (सर्वतः) सर्वप्रकारेण (दिवा) दिने (नक्तम्) रात्रौ (च) (विश्वतः) सर्वासु दिक्षु ॥

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    विषय

    स्वस्तिदा:-अपराजितः

    पदार्थ

    १. (स्वस्तिदा) = कल्याण करनेवाला, (विशां पति:) = प्रजाओं का रक्षक (वृत्रहा) = ज्ञान की आवरणभूत वासनाओं को नष्ट करनेवाला, (विमृधः) = शत्रु-विनाशकारी, (वशी) = सबका वशयिता, (इन्द्रः) = परमैश्वर्यशाली प्रभु (ते मणिं बध्नातु) = तेरे शरीर में इस वीर्यमणि को बाँधे। प्रभुकृपा से वीर्य शरीर में ही सुरक्षित हो। वस्तुतः इस वीर्य के द्वारा ही प्रभु हमारे लिए कल्याण व विजय प्राप्त करानेवाले होते हैं। २.वे प्रभु (जिगीवान्) = जयशील हैं, (अपराजित:) = कभी पराजित नहीं होते, (सोमपा:) = प्रभु ही हमारे शरीर में सोम [वीर्य] का पान करनेवाले हैं। इस सोमपान द्वारा (अभयंकरः) = हमें निर्भयता प्राप्त कराते हैं और (वृषा) = हमारे लिए सब सुखों का सेचन करते हैं। (स:) = वे 'अभंयकर वृषा' प्रभु इस मणिबन्धन द्वारा (त्वा) = तुझे (सर्वतः रक्षतु) = सब भयनिमित्तों से बचाएँ। वे प्रभु (दिवा नक्तं च) = दिन और रात (विश्वत:) = सब ओर से रक्षित करें।

    भावार्थ

    प्रभु ने शरीर में इस वीर्यमणि का बन्धन किया है। इसप्रकार प्रभु हमें कल्याण व विजय प्राप्त कराते हैं। यह वीर्यमणि दिन-रात सब ओर से हमारा रक्षण करती है।

    अगले सूक्त की ऋषिका 'मातृनामा' है। यह अपनी युवति कन्या के लिए उत्तम पति का वरण करती हुई सचमुच 'उत्तम परिवार का निर्माण करनेवाली' होने से मातृनामा कहलायी है। विषय [देवता] भी यही है। कैसे पति का वरण करना है? इस विचार से सूक्त का आरम्भ होता है-

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    भाषार्थ

    (स्वस्तिदाः) कल्याणप्रद (विशांपतिः) प्रजाओं का पति अर्थात् रक्षक, (वृत्रहा) पापनाशक या आवरण अर्थात् घेरा डालने वाले शत्रु का हनन करने वाला (विमृधः) संग्रामों से रहित अर्थात् जिसके साथ संग्राम करने वाला कोई शत्रु नहीं रहा, (वशी) सब को वश में किये हुआ, (जिगीवान्) जयशील, (अपराजितः) जो कभी पराजित नहीं हुआ, (सोमपाः) वीर्य शक्ति की रक्षा करने वाला, (अभयङ्करः) प्रजा को भयरहित करने वाला (वृषा) सुखवर्षी (इन्द्रः) सम्राट्, (ते) हे [राष्ट्र के राजन्] तेरे लिये, अर्थात् तेरी रक्षा के लिये तेरे साथ (मणिम्) पुरुषरत्न सेनाध्यक्ष को (बध्नातु) सुदृढ़बद्ध करे। (सः) वह पुरुषरत्न (सर्वतः) सब प्रकार (विश्वतः) तथा सब ओर से (दिवा नक्तम्, च) दिन और रात (त्वा रक्षतु) तुझे सुरक्षित करे।

    टिप्पणी

    [प्रत्येक राष्ट्र के राष्ट्रपति-राजा की सुरक्षा के लिये, साम्राज्य का अधिपति सम्राट्, सेनाध्यक्ष नियत करे। निज सेनाध्यक्ष की नियुक्ति का अधिकार राष्ट्रपति को नहीं। यह अधिकार सम्राट् का है। ताकि उसके राष्ट्रों में कहीं विप्लव हो जाय तो सम्राट् द्वारा नियुक्त सेनाध्यक्ष सम्राट् की आज्ञानुसार उस का शमन कर सके। मृधः संग्रामनाम (निघं० २।१७)। सोम= Semen [वीर्य] अथवा बलकारी सोम-रस का पीने वाला]।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Pratisara Mani

    Meaning

    O humanity on earth, may Indra, lord giver of all round well being, protector of the people, destroyer of the demons of darkness, eliminator of the violent, all controller, all victorious, never defeated, lover of soma peace and joy of life, giver of freedom from fear and oppression, virile and generous, bless you with the jewel of triple armour for inviolable peace, protection and happiness. May he protect you all round, day and night, always, all time.

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    Translation

    May the resplending Lord, the bestower of weal, the Lord of people, slayer of nescience, subduer of hateful enemies, the conqueror, ever-undefeated, provider of freedom from fear, the showerer of gifts, put this blessing on you. May He guard you day and night on all sides and from all.

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    Translation

    O man of merit ! may bind on you this Mani the King who si the master of the subject, who is the giver of peace and safety, who is dispeller of troubles, who is the conqueror of enemies, who is victorious, undefeated, protector of knowledge, feat-dispeller and powerful. May he protect you on all sides by day and night.

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    Translation

    May God, the Bestower of bliss. Lord of the subjects, Dispeller of ignorance. Controller of foes, conqueror, unconquered, Preserver of kingdom, Granter of fearlessness, Omnipotent, instruct thee in Vedic teaching, and protect thee round about, by night and day on every side.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २२-अस्य मन्त्रस्य। बहवः पदार्थाः साधिताः-अ० १।२१।१। अत्र तेषां पर्य्यायवाचिनो दीयन्ते (स्वस्तिदाः) क्षेमप्रदः (विशां पतिः) प्रजानां पालकः (वृत्रहा) अन्धकारनाशकः (विमृधः) शत्रून् (वशी) वशयिता (इन्द्रः) परमेश्वरः (बध्नातु) धारयतु (ते) तुभ्यम् (मणिम्) म० १। श्रेष्ठनियमम् (जिगीवान्) अ० ४।२२।६। जयशीलः (अपराजितः) अनभिभूतः (सोमपाः) ऐश्वर्यरक्षकः (अभयङ्करः) अभयप्रदः (वृषा) महाबली (सः) इन्द्रः (त्वा) त्वाम् (रक्षतु) (सर्वतः) सर्वप्रकारेण (दिवा) दिने (नक्तम्) रात्रौ (च) (विश्वतः) सर्वासु दिक्षु ॥

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