अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 8/ मन्त्र 14
ऋषिः - भृग्वङ्गिराः
देवता - परसेनाहननम्, इन्द्रः, वनस्पतिः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - शत्रुपराजय सूक्त
56
वन॒स्पती॑न्वानस्प॒त्यानोष॑धीरु॒त वी॒रुधः॑। द्वि॒पाच्चतु॑ष्पादिष्णामि॒ यथा॒ सेना॑म॒मूं हन॑न् ॥
स्वर सहित पद पाठवन॒स्पती॑न् । वा॒न॒स्प॒त्यान् । ओष॑धी: । उ॒त । वी॒रुध॑: । द्वि॒ऽपात् । चतु॑:ऽपात् । इ॒ष्णा॒मि॒ । यथा॑ । सेना॑म् । अ॒मूम् । हन॑न् ॥८.१४॥
स्वर रहित मन्त्र
वनस्पतीन्वानस्पत्यानोषधीरुत वीरुधः। द्विपाच्चतुष्पादिष्णामि यथा सेनाममूं हनन् ॥
स्वर रहित पद पाठवनस्पतीन् । वानस्पत्यान् । ओषधी: । उत । वीरुध: । द्विऽपात् । चतु:ऽपात् । इष्णामि । यथा । सेनाम् । अमूम् । हनन् ॥८.१४॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
शत्रु के नाश का उपदेश।
पदार्थ
(वनस्पतीन्) सेवनीय शास्त्रों के पालन करनेवाले पुरुषों, (वानस्पत्यान्) सेवनीय शास्त्रों के पालन करनेवालों के सम्बन्धी पदार्थों, (ओषधीः) अन्न आदि ओषधियों (उत) और (वीरुधः) जड़ी बूटियों (द्विपात्) दोपाये और (चतुष्पात्) चौपाये को (इष्णामि) मैं प्राप्त करता हूँ (यथा) जिससे वे सब (अमूम् सेनाम्) उस सेना को (हनन्) मारें ॥१४॥
भावार्थ
सेनाध्यक्ष राजा सब उत्तम पुरुषों और उत्तम पदार्थों को साथ लेकर शत्रुओं को मारे ॥१४॥
टिप्पणी
१४−(वनस्पतीन्) अ० ३।६।६। [वनस्पते] वनस्य सम्भजनीयस्य शास्त्रस्य पालक-इति दयानन्दभाष्ये, यजु० २७।२१। सेवनीयशास्त्राणां पालकान् (वानस्पत्यान्) अ० ३।६।६। सेवनीयशास्त्राणां पालकानां सम्बन्धिनः पदार्थान् (ओषधीः) अन्नादीन् (उत) अपिच (वीरुधः) लतादीन् (द्विपात्) विभक्तेः सुः। द्विपादम्। पादद्वयोपेतं मनुष्यादिकम् (चतुष्पात्) गवाश्वहस्त्यादिकम् (इष्णामि) इष गतौ। गच्छामि। प्राप्नोमि (यथा) येन प्रकारेण (सेनाम्) (अमूम्) दृश्यमानाम् (हनन्) लेटि रूपम्। ते घ्नन्तु ॥
विषय
सेना के लिए आवश्यक पदार्थों का जुटाना
पदार्थ
१. (वनस्पतीन्) = बिना पुष्प के फलवाली वनस्पतियों को, (वानस्पत्यान्) = पुष्पों से फलवाले वानस्पत्यों को (ओषधी:) = फलपाकान्त धान्य आदि को, (उत) = और (वीरुधः) = वीरुधों को–बेलों को, इनके अतिरिक्त द्(विपात्) = दो पाँववाले मनुष्यों को तथा (चतुष्यात्) = बैल-घोड़े आदि पशुओं को इसप्रकार (इष्णामि) = शीघ्रता से यथास्थान पहुँचाता हूँ, (यथा) = जिससे (अमूं सेनाम्) = उस शत्रुसेना को ये (हनन्) = मारनेवाले हों। २. अपनी सेना को आवश्यक पदार्थ प्राप्त न होंगे तो सैनिकों में शत्रओं से लड़ने का उत्साह मन्द पड़ जाएगा। उस स्थिति में शत्रुसैन्यविध्वंस की बात तो दर रही, यही भय रहेगा कि अपनी सेना में ही कुछ उपद्रव न खड़ा हो जाए।
भावार्थ
सेना को खान-पान के व अन्य सब साधन प्राप्त कराने आवश्यक हैं। उनके अभाव में सैनिकों के उत्साह में कमी होगी और वे शत्रुसैन्य को पराजित न कर पाएंगे।
भाषार्थ
(वनस्पतीन्, वानस्पत्यान्) फलदार वृक्षों, (ओषधीः) ओषधियों, (उत) तथा (वीरुधः) लताओं को, (द्विपात्, चतुष्पाद्) तथा दो-पायों और चौपायों को (इष्णामि) मैं बार-बार भेजता हूं (यथा) ताकि वे (अमूम्, सेनाम्) उस सेना का (हनन्) हनन करें।
टिप्पणी
[अभिप्राय यह है कि युद्ध में पकड़े गये सैनिकों को, वृक्षों के फलों, ओषधियों और सब्जी लताओं को पूर्व से ही विषाक्त कर, उनके घेरे में रखना चाहिये, ताकि उन्हें खा कर और औषधियों का सेवन कर वे स्वतः मरते चले जांय, और मांसभक्षी पक्षी तथा मांसभक्षी पशु उन्हें खाकर और उनका सर्वथा विनाश कर दें। इष्णामि= इष आभीक्ष्ण्ये (क्रयादिः)। वृक्ष और लताएं तो पूर्वतः स्थित हैं, ओषधियों तथा मांसभक्षियों को बार-बार भेजने का निर्देश हुआ है। वनस्पतिः, वानस्पत्यः = "वानस्पत्यः फलैः पुष्पात् तैरपुष्पाद् वनस्पतिः" अर्थात् जिन पर बिना फूलों के फल लगें वे वृक्ष वनस्पति हैं, तथा जिन पर फूलों के पश्चात् फल लगें वे वृक्ष वानस्पत्य हैं। उद्देश्य है "हनन", अतः हननोपायों का अवलम्बन कहा है]।
विषय
शत्रुनाशक उपाय।
भावार्थ
(वनस्पतीन्) वनस्पतियों, वृक्षों और (वानस्पत्यान्) वनस्पतियों या वृक्षों या लकड़ी के बने पदार्थों, (ओषधीः) ओषधियों और (वीरुधः) लताओं को और (चतुष्पात्) चौपायों और (द्विपात्) दोपायों को मैं (इष्णामि) इस रूप से प्रयोग करूं (यथा) जिस प्रकार से (अमून्) उस दूरस्थ (सेनाम्) सेना को (हनन्) विनाश करें। ‘इष्णासि’ इषु गतौ दिवादिः। अत्र विकरणव्यत्ययः।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
भृग्वंगिरा ऋषिः। इन्द्रः वनस्पतिः सेना हननश्च देवताः। १, ३, ५, १३,१८, २,८-१०,२३। उपरिष्टाद् बृहती। ३ विराट् बृहती। ४ बृहती पुरस्तात् प्रस्तारपंक्तिः। ६ आस्तारपंक्तिः। ७ विपरीतपादलक्ष्मा चतुष्पदा अतिजगती। ११ पथ्या बृहती। १२ भुरिक्। १९ विराट् पुरस्ताद बृहती। २० निचृत् पुरस्ताद बृहती। २१ त्रिष्टुप्। २२ चतुष्पदा शक्वरी। २४ त्र्यवसाना उष्णिग्गर्भा त्रिष्टुप शक्वरी पञ्चपदा जगती। चतुर्विंशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Enemies’ Rout
Meaning
I love and develop herbs, plants, trees and their products, fruits and vegetables, all bipeds and all quadrupeds so that I may win over or destroy the enemy forces.
Translation
Forest trees, and those subsisting on forest trees, plants, also the creepers, bipeds and the quadrupeds - all I despatch. so that they may strike the yoder army dead.
Translation
I, the commander-in-chief desire to utilize the trees, the things made of trees, the herbaceous Plants, the plants, biped and quadruped in such a way that they could strike that army dead.
Translation
God-fearing soldiers with their equipment, trappings and outfit, herbs and plants, biped, and quadruped, send I forth that they may strike the army of the enemy dead.
Footnote
Herbs and plants: Medicines required for the wounded soldiers. Quadruped: Horses, mules, elephants, etc, required for transport. 'I' refers to the Commander-in-Chief.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१४−(वनस्पतीन्) अ० ३।६।६। [वनस्पते] वनस्य सम्भजनीयस्य शास्त्रस्य पालक-इति दयानन्दभाष्ये, यजु० २७।२१। सेवनीयशास्त्राणां पालकान् (वानस्पत्यान्) अ० ३।६।६। सेवनीयशास्त्राणां पालकानां सम्बन्धिनः पदार्थान् (ओषधीः) अन्नादीन् (उत) अपिच (वीरुधः) लतादीन् (द्विपात्) विभक्तेः सुः। द्विपादम्। पादद्वयोपेतं मनुष्यादिकम् (चतुष्पात्) गवाश्वहस्त्यादिकम् (इष्णामि) इष गतौ। गच्छामि। प्राप्नोमि (यथा) येन प्रकारेण (सेनाम्) (अमूम्) दृश्यमानाम् (हनन्) लेटि रूपम्। ते घ्नन्तु ॥
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