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अथर्ववेद के काण्ड - 8 के सूक्त 9 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 9/ मन्त्र 26
    ऋषिः - अथर्वा देवता - कश्यपः, समस्तार्षच्छन्दांसि, ऋषिगणः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - विराट् सूक्त
    70

    ए॒को गौरेक॑ एकऋ॒षिरेकं॒ धामै॑क॒धाशिषः॑। य॒क्षं पृ॑थि॒व्यामे॑क॒वृदे॑क॒र्तुर्नाति॑ रिच्यते ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    एक॑: । गौ: । एक॑: । ए॒क॒ऽऋ॒षि: । एक॑म् । धाम॑ । ए॒क॒ऽधा । आ॒ऽशिष॑: । य॒क्षम् । पृ॒थि॒व्याम् । ए॒क॒ऽवृत् । ए॒क॒ऽऋ॒तु: । न । अति॑ । रि॒च्य॒ते॒ ॥९.२६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    एको गौरेक एकऋषिरेकं धामैकधाशिषः। यक्षं पृथिव्यामेकवृदेकर्तुर्नाति रिच्यते ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    एक: । गौ: । एक: । एकऽऋषि: । एकम् । धाम । एकऽधा । आऽशिष: । यक्षम् । पृथिव्याम् । एकऽवृत् । एकऽऋतु: । न । अति । रिच्यते ॥९.२६॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 8; सूक्त » 9; मन्त्र » 26
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    ब्रह्म विद्या का उपदेश।

    पदार्थ

    (एकः) एक [सर्वव्यापक परमेश्वर] (गौः) [लोकों का] चलानेवाला, (एकः) एक (एकऋषिः) अकेला ऋषि [सन्मार्गदर्शक], (एकम्) एक [ब्रह्म] (धाम) ज्योतिःस्वरूप है, (एकधा) एक प्रकार से (आशिषः) हित प्रार्थनाएँ हैं। (पृथिव्याम्) पृथिवी पर (एकवृत्) अकेला वर्तमान (यक्षम्) पूजनीय [ब्रह्म], (एकर्तुः) एक ऋतुवाला [एकरस वर्तमान परमात्मा] [किसी से] (न अति रिच्यते) नहीं जीता जाता है ॥२६॥

    भावार्थ

    एक, अद्वितीय, परमेश्वर अपनी अनुपम शक्ति से सर्वशासक है, उसी की आज्ञापालन सब प्राणियों के लिये हितकारक है ॥२६॥

    टिप्पणी

    २६−(एकः) इण्भीकापा०। उ० ३।४३। इण् गतौ-कन्। एति प्राप्नोतीत्येकः। सर्वव्यापकः केवलः परमेश्वरः (न) निषेधे (अति रिच्यते) पराभूयते केनापि। अन्यत् पूर्ववत् म० २५ ॥

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    विषय

    एकवृत्' यक्ष

    पदार्थ

    १. (क:) = कौन (नु) = निश्चय से (गौ:) = संसार-शकट का बैंचनेवाल बैल [अनड्वान्] है? (क:) = कौन (एक:) = अद्वितीय (ऋषि:) = तत्त्वद्रष्टा है, (उ) = और (कीं धाम) = कौन तेज है? (का: आशिष:) = [आशास् to order, to command] कौन-सी शासक शक्तियाँ हैं। (पृथिव्याम्) = इस पृथिवी पर (यक्षम्) = सबका संगतिकरण करनेवाला-सब पदार्थों को एक सूत्र में पिरोनेवाला (एकवृत्) = अकेला ही होनेवाला (एकर्तुः) = अकेला ही गति देनेवाला [ऋगती], (स:) = वह (कतमः नु) = निश्चय ये कौन-सा है? २. उत्तर देते हुए कहते हैं कि-(एक: गौ:) = वह संसार शकट का वहन करनेवाला अनड्वान्-अद्वितीय प्रभु ही है। (एकः एकऋषि:) = वही अद्वितीय तत्वद्रष्टा है। (एकं धाम) = वही अद्वितीय तेज है। (एकधा आशिष:) = एक प्रकार की ही शासक शक्ति है-भिन्न-भिन्न लोगों में भिन्न-भिन्न शासक शक्तियाँ नहीं हैं। (पृथिव्याम्) = इस पृथिवी पर (यक्षम्) = पूज्य, सब लोकों का संगतिकरण करनेवाला (एकवृत्) = एक ही है, (एकर्तुः) = वह एक ही गति देनेवाला है। (न अतिरिच्यते) = उससे बढकर कोई नहीं है।

    भावार्थ

    प्रभु इस संसार-शकट का वहन कर रहे हैं। वे तत्वद्रष्टा है, तेज:पुञ्ज हैं, एकमात्र शासक हैं। वे सब लोक-लोकान्तरों का संगतिकरण करनेवाले प्रभु एक ही हैं। वे ही सारे ब्रह्माण्ड को गति दे रहे हैं। उनसे बढ़कर कोई नहीं है।

    इसप्रकार प्रभु से शासित संसार को देखनेवाला यह ज्ञानी मानव-समाज में भी शासन व्यवस्था लाने का चिन्तन करता है। इसका उपदेश देनेवाला यह आचार्य स्वयं स्थिर वृत्तिवाला होने से 'अथर्वा' बनता है। यह 'अथर्वाचार्य' ही अगले सूक्त का ऋषि है -

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    भाषार्थ

    (एकः) एक (गौः) गौ है, (एकः) एक है (एक ऋषिः) एक ऋषि है (एकम्) एक (धामः) स्थान अर्थात् आश्रय है, तथा तेजों में तेज है, (एकधा) एक ही प्रकार की (आशिषः) आशीर्वादोक्तियां हैं। (पृथिव्याम्) पृथिवी में (यक्षम्) पूजनीय (एकवृत्) एक ही वर्तमान है, (एकर्तुः) एक ही ऋतु है, (न अति रिच्यते) उस से बढ़कर और कोई नहीं।

    टिप्पणी

    [मन्त्र (२४) में “गृष्टि" द्वारा गौ का वर्णन हुआ है, जो कि दुग्ध द्वारा सब को तृप्त करती है। मन्त्र (२५-२६) में वास्तविक गौ आदि के सम्बन्ध में प्रश्न किये हैं, तथा उत्तर दिये हैं। वास्तविक गौ, जो कि सबके साथ “गृष्टि” को भी तृप्त करती है, वह है पृथिवी। "गौः पृथिवीनाम" (निघं० १।१)। पृथिवी से गृष्टि भी पैदा होती, और पार्थिव घास आदि द्वारा परिपुष्ट होकर दुग्ध प्रदान करती है। पृथिवी के अन्नरूपी हव्य तथा घृत द्वारा देवयज्ञ होता, परमेश्वर के प्रति आहुतियां दी जातीं; और पृथिवी से मनुष्यादि उत्पन्न होकर पृथिवी द्वारा प्राप्त प्रश्नों से तृप्त होते हैं। अतः वास्तविक गौ है पृथिवी। तथा एक ही ऋषि है परमेश्वर। ऋषि हैं मन्त्रद्रष्टा या मन्त्रार्थद्रष्टा। परमेश्वर तो सभी वेदों तथा मन्त्रार्थों का पारदृश्वा है। अतः वह ही एक ऋषि है, मुख्य ऋषि है। परमेश्वर ही सब के लिये एक धामरूप है, एकाश्रयरूप है। वह ही सब धामों में धाम है, सब तेजस्वियों में तेजोरूप है। वेदों द्वारा दिये उस के आशीर्वाद सब के लिये एकसमान हैं। स्त्री, शूद्र आर्य, अनार्य सब के लिये उस के दिये आशीर्वादों में भेदभाव नहीं। उसने आशीर्वादरूप में दी 'कल्याणी वेदवाक्' सभी के लिये है। यक्षम् है ब्रह्म१। वह पूजनीय है "यक्ष पूजायाम्" (चुरादिः)। पृथिवी में यक्ष्म अर्थात् ब्रह्म पूजनीय है। "एकवृत्"२ पूजा की दृष्टि से पृथिवी में वह एक ही वर्तमान है। “एकः वर्तते" इति एकवृत्। ऋतुओं में ऋतु भी एक है, वह है वसन्त ऋतु। यथा “ऋतूनां कुसुमाकरः" (गीता १०/३५)। कुसुमाकरः= कुसुमों अर्थात् फूलों की खान। वसन्त से बढ़ कर कोई ऋतु नहीं। एकर्तुः = एकः मुख्यः ऋतुः]।३ [१. "तस्मिन् यद् यक्ष्ममात्मन्वत् तद्वै ब्रह्मविदो विदुः" (अथर्व० १०।२‌।३२)। २. "स एष एकवृत्, एक एव" (अथर्व० १३।४।१२)। तथा "ध एतं देव मेकवृतं वेद" (अथर्व० १३।४।२।(१५)। ३. सूक्त ९ सम्पूर्ण। इस के पश्चात् सूक्त ९ (मन्त्र २१) में कथित "अष्टमी रात्रि" के एकाष्टका स्वरूप का स्पष्टीकरण किया गया है।

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    विषय

    सर्वोत्पादक, सर्वाश्रय परम शक्ति ‘विराट’।

    भावार्थ

    उत्तर यह है कि (एकः गौः) वह एकमात्र परमात्मा ही (गौः) इस चराचर को चलाने वाला महावृषभ है। और वही (एकः) एकमात्र (ऋषिः) सर्वाध्यक्ष है। वही (एकं धाम) एक मात्र सबका धारण करने वाला ‘बल’ है और सबका आश्रय है। (एकधा आशिषः) वे सब नियामक शक्तियां भी एक ही रूप की ब्रह्ममयी है, (पृथिव्याम्) पृथिवी पर (एकवृत्) एकमात्र वरणीय, सबसे श्रेष्ठ (एक-ऋतुः) एक ऋतु के समान या एकमात्र सबका प्रेरक प्राणरूप (यज्ञम्) सबको परस्पर संगत और व्यवस्थित करने वाला बल भी वही एक है, (न अति रिच्यते) उससे बढ़कर दूसर नियामक भी कोई नहीं है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा काश्यपः सर्वे वा ऋषयो ऋषयः। विराट् देवता। ब्रह्मोद्यम्। १, ६, ७, १०, १३, १५, २२, २४, २६ त्रिष्टुभः। २ पंक्तिः। ३ आस्तारपंक्तिः। ४, ५, २३, २४ अनुष्टुभौ। ८, ११, १२, २२ जगत्यौ। ९ भुरिक्। १४ चतुष्पदा जगती। षड्विंशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Virat Brahma

    Meaning

    One and only one Supreme is the Mother Cow, sole generator, One visionary creator, the One self- refulgent haven and home, One blessing that comprehends all, the One adorable on earth, constant beyond all change of seasons whom none can reach, none comprehend, none exceed and none transcend. Brahma Supreme.

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    Translation

    (That) one is the cow. (That) one is the one-seer. (That) one is the abode. (That) one is the blessings. On the earth, (that) one is one Lord, worthy of thought and adoration and of season; He is untranscended (natiricyate).

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    Translation

    God is the only resisting power, God is the only seer of all seers, God is the only abode of the world, God is only the benediction of all benedictions, God is the one only spirit on the wondrous universe, God is the only order and God is the single order and he is never limited by time and space.

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    Translation

    God alone is the Revolver of planets. God alone reveals the path of righteousness. He alone sustains the universe. He controls all objects. On this earth He alone is Adorable, Existent and Timeless. He is Unconquerable.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २६−(एकः) इण्भीकापा०। उ० ३।४३। इण् गतौ-कन्। एति प्राप्नोतीत्येकः। सर्वव्यापकः केवलः परमेश्वरः (न) निषेधे (अति रिच्यते) पराभूयते केनापि। अन्यत् पूर्ववत् म० २५ ॥

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