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अथर्ववेद के काण्ड - 9 के सूक्त 3 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 3/ मन्त्र 19
    ऋषिः - भृग्वङ्गिराः देवता - शाला छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - शाला सूक्त
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    ब्रह्म॑णा॒ शालां॒ निमि॑तां क॒विभि॒र्निमि॑तां मि॒ताम्। इ॑न्द्रा॒ग्नी र॑क्षतां॒ शाला॑म॒मृतौ॑ सो॒म्यं सदः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ब्रह्म॑णा । शाला॑म् । निऽमि॑ताम् । क॒विऽभि॑: । निऽमि॑ताम् । मि॒ताम् । इ॒न्द्रा॒ग्नी इति॑ । र॒क्ष॒ता॒म् । शाला॑म् । अ॒मृतौ॑ । सो॒म्यम् । सद॑: ॥३.१९॥


    स्वर रहित मन्त्र

    ब्रह्मणा शालां निमितां कविभिर्निमितां मिताम्। इन्द्राग्नी रक्षतां शालाममृतौ सोम्यं सदः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    ब्रह्मणा । शालाम् । निऽमिताम् । कविऽभि: । निऽमिताम् । मिताम् । इन्द्राग्नी इति । रक्षताम् । शालाम् । अमृतौ । सोम्यम् । सद: ॥३.१९॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 9; सूक्त » 3; मन्त्र » 19
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    शाला बनाने की विधि का उपदेश।[इस सूक्त का मिलान अथर्व काण्ड ३ सूक्त १२ से करो]

    पदार्थ

    (अमृतौ) मरणरहित [सुखप्रद] (इन्द्राग्नी) पवन और अग्नि (ब्रह्मणा) चारों वेद जाननेहारे विद्वान् करके (निमिताम्) जमाई हुई [नेव डाली गयी] (शालाम्) शाला की, (कविभिः) विद्वानों [शिल्पियों] करके (मिताम्) मापी गई और (निर्मिताम्) दृढ़ बनायी गयी (शालाम्) शाला, (सोम्यम्) ऐश्वर्ययुक्त (सदः) घर की (रक्षताम्) रक्षा करें ॥१९॥

    भावार्थ

    बड़े विद्वानों और शिल्पी विश्वकर्माओं की सम्मति से बनाये हुए घर वायुयन्त्र और अग्नियन्त्र आदि लगाने के योग्य हों ॥१९॥ यह मन्त्र स्वामिदयानन्दकृतसंस्कारविधि, गृहाश्रमप्रकरण में व्याख्यात है ॥

    टिप्पणी

    १९−(ब्रह्मणा) चतुर्वेदज्ञेन ब्राह्मणेन (शालाम्) गृहम् (निमिताम्) प्रतिष्ठापिताम् (कविभिः) मेधाविभिः। शिल्पिभिः (निर्मिताम्) सुदृढं निर्मिताम् (मिताम्) परिमाणयुक्ताम् (इन्द्राग्नी) वायुपावकौ (रक्षताम्) (शालाम्) (अमृतौ) मरणरहितौ। सुखकरौ (सोम्यम्) अ० ३।१४।१३। ऐश्वर्यमयम् (सदः) गृहम् ॥

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    विषय

    सौम्यं सदः

    पदार्थ

    १. (ब्रह्मणा) = ज्ञानपूर्वक (निमिताम्) = बनाई गई (कविभिः मितां निमिताम्) = ज्ञानियों से मापी गई और मानपूर्वक बनाई गई इस (शालाम्) = शाला को (इन्द्राग्नी रक्षताम्) = बल और प्रकाश रक्षित करनेवाले हों। 'इन्द्र' बल का प्रतीक है और 'अग्नि' प्रकाश का। इस (शालाम्) = शाला को (अमृतौ) = विषय-वासना के पीछे न मरनेवाले-विषयों से अनाक्रान्त पति-पत्नी [माता-पिता] रक्षित करें। २. (सदः) = यह घर (सोम्यम्) = सौम्य न कि आग्नेय भोजनों से युक्त हो। सौम्य भोजन इस घर में रहनेवालों को 'अमृत'-नीरोग व दीर्घजीवी बनाएँ।

    भावार्थ

    घर ज्ञानियों द्वारा ज्ञानपूर्वक मापकर बनाया जाए। इस घर में 'बल व प्रकाश'दोनों तत्वों को सिद्ध करने का यत्न किया जाए। सौम्य भोजनों का ही प्रयोग करते हुए यहाँ के लोग नौरोग व दीर्घजीवी हों।

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    भाषार्थ

    (ब्रह्मणा) ब्राह्मण पुरोहित द्वारा (निमिताम्) रखी गई आधार शिला वाली, (कविभिः) मेधावी शिल्पियों द्वारा (निमिताम् मिताम्) मापी गई, तथा निर्मित हुई (शालाम्) शाला को, (अमृतौ) मरने से बचाने वाले (इन्द्राग्नी) इन्द्र और अग्नि (रक्षताम्) सुरक्षित करें, तथा (सोम्यम्, सदः, रक्षताम्) सोम१ औषधि प्रधान औषधि२ गृह की रक्षा करें।३

    टिप्पणी

    [कविभिः; कविः मेधाविनाम (निघं० ३।१५)। इन्द्राग्नी= यज्ञीय-अग्नि, तथा विद्युत्। "वायुर्वेन्द्रो वाऽन्तरिक्षस्थानः" (निरु० ७।२।५) में इन्द्र को अन्तरिक्षस्थानी कहा है। अतः इन्द्र= विद्युत्।] [१. “सोमो वोरुधामधिपतिः” (अथर्व० ४।२४।७)। २. ओषधिगृह= जहां औषधियों का संग्रह किया जाय। ३. पैप्पलाद शाखा में प्रथम पाद में "चतुः स्रक्तिं परिचक्राम' पाठ है अर्थात् चार कोनों वाली तथा सब और चक्रों वाली शाला" (देखो मन्त्र १७)। चार खम्भों पर खड़ी होने के कारण शाला चतुः स्रक्ति है।]

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    विषय

    शाला, महाभवन का निर्माण और प्रतिष्ठा।

    भावार्थ

    (ब्रह्मणा) ज्ञानपूर्वक (निमितां) बनाई गई, और (कविभिः) बुद्धिमान् पुरुषों द्वारा (मिताम्) नापी और (निमितां) बनाई गई (शालाम्) शाला को (इन्द्राग्नी) वायु और अग्नि दोनों (अमृतौ) जीवन की वृद्धि करने वाले पदार्थ (सोम्यम्) सुखकारी (सदः) गृह (रक्षताम्) बनाये रक्खे।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    भृग्वङ्गिरा ऋषिः। शाला देवता। १, ५ , ८, १४, १६, १८, २०, २२, २४ अनुष्टुभः। ६ पथ्यापंक्तिः। ७ परा उष्णिक्। १५ त्र्यवसाना पञ्चपदातिशक्वरी। १७ प्रस्तारपंक्तिः। २१ आस्तारपंक्तिः। २५, ३१ त्रिपादौ प्रजापत्ये बृहत्यौ। २६ साम्नी त्रिष्टुप्। २७, २८, २९ प्रतिष्ठा नाम गायत्र्यः। २५, ३१ एकावसानाः एकत्रिंशदृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    The Good House

    Meaning

    Founded by the Brahma, presiding priest of house-building yajna, measured and designed by the Vedic architect and constructed by intelligent and imaginative builders of poetic taste to the last specification of accuracy, may Indra and Agni, sun and air and the yajnic fire and fragrance protect the home, seat of Soma joy, peace and prosperity.

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    Translation

    Let this mansion, the seat of bliss, designed by knowledgeable expert, built and constructed by sages, be protected by the immortal resplendent Lòrd and the adorable Lord.

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    Translation

    Let the everlasting air and light make comfortable the house that is built up with skill and knowledge and measured and erected by the learned architects.

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    Translation

    May air, fire, deathless forces of nature, protect the house, which affords us ease and comfort, house that was planned intelligently, built and erected by skilled, expert engineers.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १९−(ब्रह्मणा) चतुर्वेदज्ञेन ब्राह्मणेन (शालाम्) गृहम् (निमिताम्) प्रतिष्ठापिताम् (कविभिः) मेधाविभिः। शिल्पिभिः (निर्मिताम्) सुदृढं निर्मिताम् (मिताम्) परिमाणयुक्ताम् (इन्द्राग्नी) वायुपावकौ (रक्षताम्) (शालाम्) (अमृतौ) मरणरहितौ। सुखकरौ (सोम्यम्) अ० ३।१४।१३। ऐश्वर्यमयम् (सदः) गृहम् ॥

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