अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 12
ई॑जा॒नानां॑ सु॒कृतां॑ लो॒कमीप्स॒न्पञ्चौ॑दनं ब्र॒ह्मणे॒ऽजं द॑दाति। स व्याप्तिम॒भि लो॒कं ज॑यै॒तं शि॒वो॒ऽस्मभ्यं॒ प्रति॑गृहीतो अस्तु ॥
स्वर सहित पद पाठई॒जा॒नाना॑म् । सु॒ऽकृता॑म् । लो॒कम् । ईप्स॑न् । पञ्च॑ऽओदनम् । ब्र॒ह्मणे॑ । अ॒जम् । द॒दा॒ति॒ । स: । विऽआ॒प्तिम् । अ॒भि । लो॒कम् । ज॒य॒ । ए॒तम् । शि॒व: । अ॒स्मभ्य॑म् । प्रति॑ऽगृहीत:। अ॒स्तु॒ ॥५.१२॥
स्वर रहित मन्त्र
ईजानानां सुकृतां लोकमीप्सन्पञ्चौदनं ब्रह्मणेऽजं ददाति। स व्याप्तिमभि लोकं जयैतं शिवोऽस्मभ्यं प्रतिगृहीतो अस्तु ॥
स्वर रहित पद पाठईजानानाम् । सुऽकृताम् । लोकम् । ईप्सन् । पञ्चऽओदनम् । ब्रह्मणे । अजम् । ददाति । स: । विऽआप्तिम् । अभि । लोकम् । जय । एतम् । शिव: । अस्मभ्यम् । प्रतिऽगृहीत:। अस्तु ॥५.१२॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
ब्रह्मज्ञान से सुख का उपदेश।
पदार्थ
(ईजानानाम्) यज्ञ [देवपूजा, संगतिकरण, दान] कर चुकनेवाले (सुकृताम्) सुकर्मियों के (लोकम्) लोक को (ईप्सन्) चाहता हुआ पुरुष (ब्रह्मणे) ब्रह्म [परमेश्वर] के लिये (पञ्चौदनम्) पाँच भूतों [पृथिवी आदि] से सींचे हुए (अजम्) अजन्मे वा गतिशील जीवात्मा का (ददाति) दान करता है। [इसलिये] (सः) वह तू (व्याप्तिम् अभि) [सुख की] पूर्ण प्राप्ति के लिये (एतम् लोकम्) इस लोक को (जय) जीत, [जिससे, परमेश्वर करके] (प्रतिगृहीतः) स्वीकार किया हुआ [जीवात्मा] (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (शिवः) मङ्गलकारी (अस्तु) होवे ॥१२॥
भावार्थ
जो मनुष्य अग्रज आप्त विद्वानों के समान परमेश्वर की आज्ञापालन में आत्मसमर्पण करके पुरुषार्थ करता है, वह सबके लिये मङ्गलकारी होता है ॥१२॥
टिप्पणी
१२−(ईजानानाम्) म० ८। यज्ञं कुर्वताम् (सुकृताम्) सुकर्मिणाम् (लोकम्) दर्शनीयं पदम् (ईप्सन्) प्राप्तुमिच्छन् (पञ्चौदनम्) म० ८। पञ्चभूतैः सिक्तम् (ब्रह्मणे) परमेश्वराय (अजम्) जीवात्मानम् (ददाति) (सः) स त्वम् (व्याप्तिम्) विविधां सुखप्राप्तिम् (अभि) प्रति (लोकम्) (जय) उत्कर्षेण प्राप्नुहि (एतम्) (शिवः) मङ्गलकारी (अस्मभ्यम्) (प्रतिगृहीतः) ब्रह्मणा स्वीकृतः (अस्तु) ॥
विषय
इस लोक पर विजय व परमानन्द-प्राप्ति
पदार्थ
१. (ईजानानाम्) = यज्ञशील (सुकृताम्) = पुण्यकर्मा लोगों के (लोकम् ईप्सन्) = लोक को चाहता हुआ व्यक्ति (पञ्चौदनम्) = पाँचों ज्ञानेन्द्रियों से ज्ञान का भोजन ग्रहण करनेवाले (अजम्) = गति के द्वारा बुराइयों को परे फेंकनेवाले अपने को (बह्मणे ददाति) = ब्रह्म के लिए दे डालता है। जो भी पुण्यलोक की कामना करता है, वह अपने को ब्रह्म के प्रति दे डालता है। २. (स:) = वह (व्याप्तिम् अभि) = [वि आसि] सुखविशेष की प्राप्ति का लक्ष्य करके (एतं लोकं जय) = इस लोक को जीतनेवाला बन । इस लोक के विजय के बिना उस परमानन्द की प्राति सम्भव नहीं। वह (प्रतिगृहीत:) = प्रत्येक पिण्ड [वस्तु] में ग्रहण किया गया-प्रत्येक वस्तु में विद्यमान प्रभु (अस्मभ्यं शिवः अस्तु) = हमारे लिए कल्याणकर हो।
भावार्थ
उत्तम लोकों को प्राप्त करने की इच्छा से हम प्रभु के प्रति अपना अर्पण करें। परमानन्द की प्राप्ति के लिए इस लोक की विजय आवश्यक है। प्रत्येक पिण्ड में विद्यमान प्रभु हमारा कल्याण करें।
भाषार्थ
(ईजानानाम्) ध्यान-यज्ञ जिन्होंने किये हैं ऐसे (सुकृताम्) सुकर्मियों के (लोकम्) लोक की (ईप्सन्) इच्छा करता हुआ मुमुक्ष (पञ्चौदनम्, अजम्) पञ्चौदन “अज” को पञ्चौदन सहित जनन मरण रहित निज आत्मा को (ब्रह्मणे ददाति) ब्रह्म के प्रति समर्पित कर देता है। हे अज ! (सः) वह तू (एतम्) इस (व्याप्तिम् लोकम्, अभि) व्याप्ति वाले लोक पर (जय) विजय पा, और (शिवः) कल्याणमय हुआ वह (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (प्रतिगृहीतः, अस्तु) स्वीकृत हुआ हो]।
टिप्पणी
[पञ्चौदनम् अजम्=पांच इन्द्रियों के पांच भोगों सहित आत्मा को समर्पित करना। जिस लोक को मुमुक्षु चाहता है वह परिमाण में पृथिवी की अपेक्षा अधिक व्याप्त है। मुमुक्ष अभी जीवन्मुक्त की अवस्था में है, कल्याणमार्गी है, वह जब शिवरूप हो जाता है तो प्रजाजन आदर पूर्वक उसे स्वीकृत करते हैं]।
विषय
अज के दृष्टान्त से पञ्चौदन आत्मा का वर्णन।
भावार्थ
जो पुरुष (ईजानानाम्) अध्यात्म यज्ञशील (सुकृताम्) शुभ कर्मकारी पुण्यात्माओं के (लोकम् ईप्सन्) लोक को प्राप्त करने की इच्छा करता हुआ अपने (पञ्चौदनं अजम्) पञ्चौदन अज, आत्मा को (ब्रह्मणे) ब्रह्म परमात्मा में (ददाति) समर्पित कर देता है (सः) वह (एतम्) उस (लोकम्) लोक को (व्याप्तिम्) व्याप्त करके (अभिजय) साक्षात् करले। वह (प्रतिगृहीतः) ब्रह्मद्वारा स्वीकृत होकर स्वभाव को प्राप्त होकर भी (असभ्यम्) हम जैसे सामान्य लोगों के लिये (शिवः अस्तु) कल्याणकारी हो जाता है। भक्त्या माम् अभिजानाति यावान् यश्चास्मि तत्त्वतः। ततो मां यत्नतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥ गीता २८। ३५॥
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
भृगुर्ऋषिः। अजः पञ्चोदनो देवता। १, २, ५, ९, १२, १३, १५, १९, २५, त्रिष्टुभः, ३ चतुष्पात् पुरोऽति शक्वरी जगती, ४, १० नगत्यौ, १४, १७,२७, ३०, अनुष्टुभः ३० ककुम्मती, २३ पुर उष्णिक्, १६ त्रिपाद अनुष्टुप्, १८,३७ त्रिपाद विराड् गायत्री, २४ पञ्चपदाऽनुपटुबुष्णिग्गर्भोपरिष्टाद्बर्हता विराड् जगती २०-२२,२६ पञ्चपदाउष्णिग् गर्भोपरिष्टाद्बर्हता भुरिजः, ३१ सप्तपदा अष्टिः, ३३-३५ दशपदाः प्रकृतयः, ३६ दशपदा प्रकृतिः, ३८ एकावसाना द्विपदा साम्नी त्रिष्टुप, अष्टात्रिंशदर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
The Soul, the Pilgrim
Meaning
One, who aspires to the state of noble souls of holy action and divine association, dedicates the immortal soul in the existential state to the Supreme Brahma. Such aspirant as you are, O Aja, aspire and win for yourself the rise to that divine state of life, and may you, accepted and loved therein, be good and auspicious for us too as a source of inspiration.
Translation
Desirous of obtaining the world of the virtuous ones, who have performed sacrifices, one presents the unborn, made of five-fold pulp of meshed grain; to an intellectual person; as such, may you conquer completely this wide world. May this, accepted, be propitious to us.
Translation
The man desiring the state attainable by the persons performing yajnas and pious deeds, surrender the eternal soul flourished with the body of five elements to the Supreme Being. O man ! that of you win this third Ashram to attain high status and thus accepted therein be auspicious for us.
Translation
He, who, being desirous to seek the company of pious persons who per¬ form spiritual sacrifice, (Yajna) dedicates to God, his unborn soul, protected by five elements, can attain to the high rank of pious persons for the acquisition of mental peace. May he, accepted by God, be auspicious unto us
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१२−(ईजानानाम्) म० ८। यज्ञं कुर्वताम् (सुकृताम्) सुकर्मिणाम् (लोकम्) दर्शनीयं पदम् (ईप्सन्) प्राप्तुमिच्छन् (पञ्चौदनम्) म० ८। पञ्चभूतैः सिक्तम् (ब्रह्मणे) परमेश्वराय (अजम्) जीवात्मानम् (ददाति) (सः) स त्वम् (व्याप्तिम्) विविधां सुखप्राप्तिम् (अभि) प्रति (लोकम्) (जय) उत्कर्षेण प्राप्नुहि (एतम्) (शिवः) मङ्गलकारी (अस्मभ्यम्) (प्रतिगृहीतः) ब्रह्मणा स्वीकृतः (अस्तु) ॥
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
Misc Websites, Smt. Premlata Agarwal & Sri Ashish Joshi
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
Sri Amit Upadhyay
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
Sri Dharampal Arya
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
N/A
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal