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अथर्ववेद के काण्ड - 9 के सूक्त 5 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 19
    ऋषिः - भृगुः देवता - अजः पञ्चौदनः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - अज सूक्त
    41

    यं ब्रा॑ह्म॒णे नि॑द॒धे यं च॑ वि॒क्षु या वि॒प्रुष॑ ओद॒नाना॑म॒जस्य॑। सर्वं॒ तद॑ग्ने सुकृ॒तस्य॑ लो॒के जा॑नी॒तान्नः॑ सं॒गम॑ने पथी॒नाम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यम् । ब्रा॒ह्म॒णे । नि॒ऽद॒धे । यम् । च॒ । वि॒क्षु । या: । वि॒ऽप्रुष॑: । ओ॒द॒नाना॑म् । अ॒जस्य॑ । सर्व॑म् । तत् । अ॒ग्ने॒ । सु॒ऽकृ॒तस्य॑ । लो॒के । जा॒नी॒तात् । न॒: । स॒म्ऽगम॑ने । प॒थी॒नाम् ॥५.१९॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यं ब्राह्मणे निदधे यं च विक्षु या विप्रुष ओदनानामजस्य। सर्वं तदग्ने सुकृतस्य लोके जानीतान्नः संगमने पथीनाम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यम् । ब्राह्मणे । निऽदधे । यम् । च । विक्षु । या: । विऽप्रुष: । ओदनानाम् । अजस्य । सर्वम् । तत् । अग्ने । सुऽकृतस्य । लोके । जानीतात् । न: । सम्ऽगमने । पथीनाम् ॥५.१९॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 9; सूक्त » 5; मन्त्र » 19
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    हिन्दी (3)

    विषय

    ब्रह्मज्ञान से सुख का उपदेश।

    पदार्थ

    (यम्) जिस (यम्) नियम को (ब्राह्मणे) ब्रह्मज्ञानी में (च) और (अजस्य) [प्रत्येक] जीवात्मा के (ओदनानाम्) सेचन धर्म्मों की (याः) जिन (विप्रुषः) विविध पूर्तियों को (विक्षु) प्रजाओं के बीच (निदधे) उस [परमेश्वर] ने रक्खा है। (अग्ने) हे विद्वान् पुरुष ! (नः) हमारे (तत् सर्वम्) उस सबको (सुकृतस्य लोके) सुकर्मी के लोक में (पथीनाम्) मार्गों के (संगमने) संगम पर (जानीतात्) तू जान ॥१९॥

    भावार्थ

    ब्रह्मज्ञानी अपने में और सब सृष्टि में वृद्धियों के ईश्वरनियमों को विविध प्रकार विचार कर पुण्यात्माओं के मार्ग पर चलकर सुखी होवे ॥१९॥

    टिप्पणी

    १९−(यम्) (ब्राह्मणे) ब्रह्मज्ञे (निदधे) स्थापितवान् सः परमेश्वरः (यम्) यम-ड। नियमम् (च) (विक्षु) प्रजासु (विप्रुषः) प्रुष स्नेहनसेवनपूरणेषु-क्विप्। विविधपूर्तीः (ओदनानाम्) उन्देर्नलोपश्च। उ० २।७६। उन्दी क्लेदने-युच्। ओदनो मेघः-निघ० १।१०। ओदनमुदकदानं मेघम्-निरु० ६।™३४। सेचनानाम् (अजस्य) जीवात्मनः (सर्वम्) (तत्) (अग्ने) हे विद्वन् (सुकृतस्य) पुण्यात्मनः (लोके) स्थाने (जानीतात्) जानीहि (नः) अस्माकम् (संगमने) संयोगे (पथीनान्) सर्वधातुभ्य इन्। उ० ४।११८। पथे गतौ-इन्। पथाम्। मार्गाणाम् ॥

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    विषय

    'आदित्य, रुद्र व वसु' ब्रह्मचारियों का ज्ञान

    पदार्थ

    १. (यम्) = जिस आत्मज्ञान को प्रभु ने (ब्राह्मणे निदधे) = ब्रह्मज्ञानी में [आदित्य ब्रह्मचारी में] स्थापित किया है, (च) = और (यम्) = जीव के कर्तव्यों के जिस ज्ञान को (विक्षु) = कर्मों में व्याप्त होनेवाली प्रजाओं में [रुद्र ब्रह्मचारियों में] रक्खा है तथा (या) = जो (अजस्य) = जीवात्मा के (ओदनानाम्) = प्रकृति विज्ञानों के (विपुषः) = जलकण हैं, [जिन्हें कि वसु ब्रह्मचारी प्राप्त करते हैं], हे (अग्ने) = प्रभो! (तत् सर्वम्) = वह सब-ब्रह्मज्ञान, जीव-कर्तव्यज्ञान व प्रकृति विज्ञान (न:) = हमें भी (जानीतान्) = जाने, अर्थात् हमें भी प्रास हो। २. यह ज्ञान हमें उस समय प्राप्त हो जबकि हम (सुकृतस्य लोके) = पुण्य के लोक में निवास करनेवाले बनें तथा (पथीनां संगमने) = मार्गों पर सम्यक् गमन करनेवाले हों। पुण्य-कर्मों को करते हुए व मार्ग-भ्रष्ट न होते हुए हम उस सब ज्ञान विज्ञान को प्राप्त करें।

    भावार्थ

    प्रभु जो आत्मज्ञान आदित्य ब्रह्मचारियों को प्राप्त कराते हैं, जिस जीवनकर्तव्य ज्ञान को रुद्र ब्रह्मचारियों को देते हैं तथा जो प्रकृतिविज्ञान के बिन्दु बसु ब्रह्मचारियों को प्राप्त होते हैं, हम पुण्य-कर्म करते हुए व शुभ-मार्ग पर बढ़ते हुए, उस सब ज्ञान को प्राप्त करें।

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    भाषार्थ

    (यम्) जिस ओदन को (ब्राह्मणे) ब्रह्मवेत्ता तथा वेदवेत्ता आचार्य [के हाथ] में (निदधे) मैं स्थापित करता हूं, (यं च) और जिसे (विक्षु) प्रजाओं में स्थापित करता हूं, और (अजस्य) व्रीहि के (ओदनानाम् याः विप्रुषः) पके ओदनों की जो विन्दुएं हैं, (सर्वं तद्) उस सब को (अग्ने) हे प्रकाशमय तथा ज्ञानमय परमेश्वर ! (पथीनां संगमने, सुकृतस्य लोके) पथों के संगम में जहां कि सुकर्मों का लोक है वहां, तू (नः) हमारे लिये (जानीत) जान।

    टिप्पणी

    [मन्त्र में ब्राह्मण है वह आचार्य, जोकि अध्यात्म-शिक्षक है। विक्षु पद द्वारा बलिवैश्वदेव यज्ञ को सूचित किया है, जिस में कि प्राणिमात्र के लिये पक्वान्न के अंश भेंट किये जाते हैं। यथा “शुनां च पतितानां च श्वपचां पापरोगिणाम्। वायसानां कृमीणां च शनकैर्निवपेद् भुवि”। “अजस्य” द्वारा ब्रीहि सूचित किया है, जिस से तण्डुल निकाल कर आदन पकाए जाते हैं। यथा “अजसंज्ञानि बीजानि छागं नो हन्तुमर्हथ” (महाभारत, शान्तिपर्व अध्याय ३३७)। पथीनां संगमने= सम्भवतः देवमार्ग और पितृमार्ग का जहां संगम होता हो, वहां सुकृत का कोई स्थान विशेष हो जिसे कि “सुकृतस्य लोके” द्वारा निर्दिष्ट किया है]।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    The Soul, the Pilgrim

    Meaning

    Of the immortal soul’s powers and potentials, acts and sufferance, in consequence of the divine law of Karma which the Lord has vested in the Brahmana and in the people in general, and of the powers and potentials, acts of freedom and sufferance, and of the food for body, mind and soul that I offer to the Brahmana and the people in general, of all that, O lord of light, Agni, you would know in the land of divine righteousness at the cross-roads of the paths we follow and travel by for ourselves and our destiny.

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    Translation

    The bits of meshed grain of the pancaudana aja, what I deposit here with the intellectual persons and with the ordinary people, O adorable Lord, may you recognize all that of ours in the world of the virtuous deeds, at the junction of pathways.

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    Translation

    O learned ascetic! you allow to come us in the state of good acts (the Vanaprastha) and the meeting place of the other mundane pathways. all that power of the eternal soul which Divinity has in the man knowing God which power he has placed in the subjects of the world and which are the most powerful activities of this soul engaged in enjoying its worldly affections and attachments.

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    Translation

    The unborn soul, which has been placed by God in the body of a Vedic scholar, or those of ordinary mortals, possesses manifold powers of breaths. O God, let us know that all these powers are the pathways for reaching the pure state of emancipation.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १९−(यम्) (ब्राह्मणे) ब्रह्मज्ञे (निदधे) स्थापितवान् सः परमेश्वरः (यम्) यम-ड। नियमम् (च) (विक्षु) प्रजासु (विप्रुषः) प्रुष स्नेहनसेवनपूरणेषु-क्विप्। विविधपूर्तीः (ओदनानाम्) उन्देर्नलोपश्च। उ० २।७६। उन्दी क्लेदने-युच्। ओदनो मेघः-निघ० १।१०। ओदनमुदकदानं मेघम्-निरु० ६।™३४। सेचनानाम् (अजस्य) जीवात्मनः (सर्वम्) (तत्) (अग्ने) हे विद्वन् (सुकृतस्य) पुण्यात्मनः (लोके) स्थाने (जानीतात्) जानीहि (नः) अस्माकम् (संगमने) संयोगे (पथीनान्) सर्वधातुभ्य इन्। उ० ४।११८। पथे गतौ-इन्। पथाम्। मार्गाणाम् ॥

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