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अथर्ववेद के काण्ड - 9 के सूक्त 5 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 2
    ऋषिः - भृगुः देवता - अजः पञ्चौदनः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - अज सूक्त
    108

    इन्द्रा॑य भा॒गं परि॑ त्वा नयाम्य॒स्मिन्य॒ज्ञे यज॑मानाय सू॒रिम्। ये नो॑ द्वि॒षन्त्यनु॒ तान्र॑भ॒स्वाना॑गसो॒ यज॑मानस्य वी॒राः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इन्द्रा॑य । भा॒गम् । परि॑ । त्वा॒ । न॒या॒मि॒ । अ॒स्मिन् । य॒ज्ञे । यज॑मानाय । सू॒रिम् । ये । न॒: । द्वि॒षन्ति॑ । अनु॑ । तान् । र॒भ॒स्व॒ । अना॑गस: । यज॑मानस्य । वी॒रा: ॥५.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इन्द्राय भागं परि त्वा नयाम्यस्मिन्यज्ञे यजमानाय सूरिम्। ये नो द्विषन्त्यनु तान्रभस्वानागसो यजमानस्य वीराः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    इन्द्राय । भागम् । परि । त्वा । नयामि । अस्मिन् । यज्ञे । यजमानाय । सूरिम् । ये । न: । द्विषन्ति । अनु । तान् । रभस्व । अनागस: । यजमानस्य । वीरा: ॥५.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 9; सूक्त » 5; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    ब्रह्मज्ञान से सुख का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे अज, आत्मा !] (अस्मिन्) इस (यज्ञे) संगतिकरण व्यवहार में (यजमानाय) यजमान [संगतिकर्ता] को (इन्द्राय) परम ऐश्वर्य के लिये (त्वा) तुझे (सूरिम्) विद्वान् (भागम् परि) सेवनीय [परमात्मा] की ओर (नयामि) मैं लाता हूँ। (ये) जो [दोष] (नः) हमें (द्विषन्ति) सताते हैं, (तान्) उनको (अनु रभस्व) निरन्तर पकड़ [वश में कर], (यजमानस्य) श्रेष्ठ व्यवहारवाले के (वीरः) वीर पुरुष (अनागसः) निर्दोष [होवें] ॥२॥

    भावार्थ

    जो पुरुष परम ऐश्वर्यवाले परमात्मा में श्रद्धा करके अपने दोषों को मिटाते हैं, वे अपनी और संसार की उन्नति करते हैं ॥२॥

    टिप्पणी

    २−(इन्द्राय) परमैश्वर्यप्राप्तये (भागम्) भज सेवायाम्-घञ्। सेवनीयम् (परि) प्रति। अनुलक्ष्य (त्वा) जीवात्मानम् (नयामि) गमयामि (अस्मिन्) (यज्ञे) संगतिकरणे (यजमानाय) संगतिकरणशीलाय (सूरिम्) अ० २।११।४। विद्वांसम् (ये) दोषाः (नः) अस्मान् (द्विषन्ति) दूषयन्ति (अनु) निरन्तरम् (तान्) (रभस्व) लभस्व। निगृहाण (अनागसः) अ० ७।६।३। अनपराधाः (यजमानस्य) श्रेष्ठव्यवहारिणः (वीराः) शूराः ॥

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    विषय

    इन्द्राय यजमानाय

    पदार्थ

    १. (भागम्) = सेवीय [भज सेवायाम्] (सूरिम्) = ज्ञानी प्रभु को (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय, (यजमानाय) = यज्ञशील (त्वा) = तेरे लिए (अस्मिन् यज्ञे) = इस जीवन-यज्ञ में (परिनयामि) = प्राप्त कराता हूँ। जितेन्द्रिय व यज्ञशील पुरुष ही प्रभु-प्राप्ति का पात्र बनता है। २. (ये) = जो (न:) = हमें (द्विषन्ति) = अप्रीति से वर्तते है, अर्थात् जो दोष हमारे लिए हानिकर होते हैं, (तान् अनु) = उन्हें लक्ष्य करके (रभस्व) = [clasp, embrace] उस प्रभु का आलिंगन करनेवाला बन। प्रभु का आलिंगन इन सब अप्रीतिकर दोषों को दूर कर देगा। इस निर्दोष जीवनवाले (यजमानस्य) = यज्ञशील पुरुष के (वीरा:) = वीर सन्तान (अनागस:) = निर्दोष होते हैं। वे सन्तान यज्ञशील बनते हैं।

    भावार्थ

    हम जितेन्द्रिय व यज्ञशील बनते हुए उस भजनीय, ज्ञानी प्रभु को प्रास करें। प्रभु का आलिंगन हमारे जीवन को निर्दोष बनाएगा। निर्दोष यज्ञशील पुरुष के सन्तान भी निष्पाप ही बनते हैं।

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    भाषार्थ

    [आचार्य मुमुक्षु के प्रति कहता है कि] हे मुमुक्षु ! (अस्मिन् यज्ञे) इस योगरूपी, ध्यानरूपी, यज्ञ में, (त्वा सूरिम्) तुझ स्तोता को, (यजमानाय इन्द्राय) संसार-यज्ञ के रचयिता परमैश्वर्यवान परमेश्वर के लिये (भागम्) भागरूप में, (परिनयामि) मैं पूर्णतया लाता हूं। (ये) जो काम, क्रोध, लोभ आदि (नः) हमारे साथ (द्विषन्ति) द्वेष करते हैं (तान्) उन्हें (अनुरभस्व) निरन्तर तू पकड़ता रह। ताकि (यजमानस्य) संसार-यज्ञ के रचयिता के (वीराः) वीर पुत्र (अनागसः) पापों से रहित हो जाय।

    टिप्पणी

    [व्यक्ति जब तक सांसारिक भोगों में लिप्त रहता है तब तक वह परमेश्वर के लिये निजभागरूप नहीं होता। परन्तु वह मुमुक्षु होकर जब ध्यानयज्ञ में परमेश्वर का स्तोता बन जाता है तब उसे परमेश्वर निजभागरूप में स्वीकार कर लेता है। काम क्रोध लोभ आदि प्रिय तो लगते हैं, परन्तु परिणाम में ये हैं द्वेषी। मुमुक्षु को चाहिये कि वह इनकी पकड़ में न आए अपितु इन शत्रुओं को निरन्तर पकड़ कर इन्हें निज वश में करता रहें। ताकि परमेश्वर के पुत्र, वीर बनें, और वीर बनकर इन शत्रुओं पर विजय पा कर, पापों से रहित हो जाय। सूरिम्= सूरिः स्तोतृनाम (निघं० ३।१६)]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    The Soul, the Pilgrim

    Meaning

    In this yajnic course of education, yoga and Brahmacharya, I guide and conduct you, immortal soul, to the service of Indra, yajamana of the creative world yajna, on the path of your Dharma toward him, the society and the family. Take on and fight out all those weaknesses and enemies which hate and afflict us so that all brave children of the yajamana, those that institute this yajna, be free from sin and evil.

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    Translation

    At this sacrifice, I conduct you, the wise, as a portion meant for the-resplendent Lord, for whom the sacrifice is being performed. May you Seir from behind those who hate us. May the brave sons of the sacrificer be free from all blemish.

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    Translation

    O eternal soul ! you are the fortunate devotee of Indra. the Almighty God and are endowed with innate knowledge. I bring you to this yajna of the performer of yajna to know it. O learned man ! fight against those evils which cause aversion into us and let the men of the performer of yajna be pious and free from evils.

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    Translation

    O soul, in this yajna of life, I take thee the sacrifice for supremacy towards the Wise God, Overcome the vices that torment us; as all the valiant sons of God are sinless.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २−(इन्द्राय) परमैश्वर्यप्राप्तये (भागम्) भज सेवायाम्-घञ्। सेवनीयम् (परि) प्रति। अनुलक्ष्य (त्वा) जीवात्मानम् (नयामि) गमयामि (अस्मिन्) (यज्ञे) संगतिकरणे (यजमानाय) संगतिकरणशीलाय (सूरिम्) अ० २।११।४। विद्वांसम् (ये) दोषाः (नः) अस्मान् (द्विषन्ति) दूषयन्ति (अनु) निरन्तरम् (तान्) (रभस्व) लभस्व। निगृहाण (अनागसः) अ० ७।६।३। अनपराधाः (यजमानस्य) श्रेष्ठव्यवहारिणः (वीराः) शूराः ॥

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