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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 6/ मन्त्र 1
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - अतिथिः, विद्या छन्दः - नागी त्रिपदा गायत्री सूक्तम् - अतिथि सत्कार
    112

    यो वि॒द्याद्ब्रह्म॑ प्र॒त्यक्षं॒ परूं॑षि॒ यस्य॑ संभा॒रा ऋचो॒ यस्या॑नूक्यम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    य: । वि॒द्यात् । ब्रह्म॑ । प्र॒ति॒ऽअक्ष॑म् । परूं॑षि । यस्य॑ । स॒म्ऽभा॒रा: । ऋच॑: । यस्य॑ । अ॒नू॒क्य᳡म् ॥६.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यो विद्याद्ब्रह्म प्रत्यक्षं परूंषि यस्य संभारा ऋचो यस्यानूक्यम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    य: । विद्यात् । ब्रह्म । प्रतिऽअक्षम् । परूंषि । यस्य । सम्ऽभारा: । ऋच: । यस्य । अनूक्यम् ॥६.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 9; सूक्त » 6; पर्यायः » 1; मन्त्र » 1
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    हिन्दी (3)

    विषय

    संन्यासी और गृहस्थ के धर्म का उपदेश।

    पदार्थ

    (यः) संयमी पुरुष [अथवा जो कोई विद्वान् हो वह] (प्रत्यक्षम्) प्रत्यक्ष करके (ब्रह्म) ब्रह्म [परमात्मा] को (विद्यात्) जाने (यस्य) जिस [ब्रह्म] के (परूँषि) पालन सामर्थ्य (संभाराः) विविध संग्रह और (यस्य) जिसका (अनूक्यम्) अनुकूल वाक्य (ऋचः) ऋचाएँ [स्तुतियोग्य वेदमन्त्र] हैं ॥१॥

    भावार्थ

    विद्वान् संयमी पुरुष सर्वपोषक, सर्वोपदेशक परमात्मा को साक्षात् कर सकते हैं ॥१॥ मन्त्र १-४ और ६ स्वामिदयानन्दकृत संस्कारविधि संन्यासाश्रमप्रकरण में व्याख्यात हैं ॥

    टिप्पणी

    १−(यः) यम नियमने-ड। संयमी। संन्यासी। अथवा यो विद्वान् भवतु सः (विद्यात्) जानीयात् (ब्रह्म) अ० १।८।४। सर्वेभ्यो बृहन्तं परमेश्वरम् (प्रत्यक्षम्) साक्षात्करेण (परूँषि) अर्तिपॄवपि०। उ० २।११७। पॄ पालनपूरणयोः−उसि। पालनसामर्थ्यानि (यस्य) ब्रह्मणः (संभाराः) विविधाः संग्रहाः (ऋचः) ऋच स्तुतौ−क्विप्। ऋग् वाङ्नाम-निघ० १।११। स्तुत्या वेदवाचः (यस्य) (अनूक्यम्) ऋहलोर्ण्यत्। पा० ३।१।१२४। अनु+वच परिभाषणे-ण्यत्, छान्दसं सम्प्रसारणम्, चजोः कु घिण्ण्यतोः। पा० ७।३।५२। इति कुत्वम्। अनुकूलवाक्यम् ॥

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    विषय

    यः [संयमी]

    पदार्थ

    १. (य:) = [यम्-ड] संयमी पुरुष (प्रत्यक्षं ब्रह्म विद्यात्) = प्रत्यक्ष ब्रह्म को जानता है। उस ब्रह्म को जानता है (यस्य) = जिसकी (संभारा:) = यज्ञ-सामग्रियाँ ही-यज्ञ के लिए एकत्र किये जानेवाले द्रव्य ही (परूंषि) = परु है-जोड़ हैं, (ऋच:) = ऋचाएँ ही (यस्य) = जिसकी (अनूक्यम्) = रीढ़ की हड्डी [spine] है। २. (सामानि) = साम-मन्त्र ही (यस्य) = जिसके (लोमानि) = लोम हैं, (यजुः) = यजुर्मन्त्र को (हृदयम्) = हृदय (उच्यते) = कहा जाता है और (परिस्तरणम्) = चारों और बिछाने के आसन ही (हवि:) = हवि हैं-दानपूर्वक अदन हैं। इसप्रकार का पवित्र यज्ञमय जीवनवाला पुरुष ही मानो 'प्रत्यक्ष ब्रह्म' है। एक संयमी पुरुष को चाहिए कि ऐसे अतिथि में ब्रह्म के दर्शन का प्रयत्न करे और उसका उचित सत्कार करे।

    भावार्थ

    पवित्र, यज्ञमय, वेदज्ञ, विद्वान् अतिथि में हम प्रत्यक्ष ब्रह्म को देखने का प्रयत्न करें और उसका उचित सम्मान करें।

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    भाषार्थ

    (यः) जो अतिथिपति अर्थात् गृहस्थी, अतिथि को (प्रत्यक्षम् ब्रह्म) साक्षात् वेदरूप या ब्रह्मरूप (विद्यात्) जाने (यस्य) जिसके कि (परूंषि) अङ्ग (संभारा) यज्ञ के साधन रूप हैं, और (यस्य) जिस का (अनूक्यम्) ज्ञाननाड़ी संस्थान (ऋचः) ऋग्वेद के मन्त्र है।

    टिप्पणी

    [संभारा = यज्ञ के साधन स्रुव, स्रुक् आज्यस्थाली आदि। अनूक्य है मस्तिष्क तथा जिसके द्वारा ज्ञान होता है, ऋग्वेद की ऋचाएं भी ज्ञान प्रदायिनी हैं]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Atithi Yajna: Hospitality

    Meaning

    One who would know Brahma first hand by direct experience may know that Brahma is that Supreme Purusha, Ultimate living Reality, which as a ‘Person’ is constituted of the entire structure of existence and its knowledge: whose spine is the Rks.

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    Subject

    Atithih - Vidya

    Translation

    Who knows the Lord of knowledge directly, whose joints are the sacrificial equipment; whose spine are the Rk verses;

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    Translation

    The qualified guest visiting to a house-holder’s home should be he who knows through intuititive perception the Supreme Spirit whose members are the stuff of yajna, whose spine are the verses (Riks) whose hair are the psalms of Saman, whose heart is called yajus, and whose coverlet is known as oblation.

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    Translation

    A learned person is worthy of honor, who verily knows God, Whose nourishing strength is manifold, Whose Vedic verses are friendly, favorable words.

    Footnote

    Verses 1-4 and 6th verse have been explained by Maharshi Dayananda in the Sanskar Vidhi, in the chapter on Sanyasa Ashrama.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(यः) यम नियमने-ड। संयमी। संन्यासी। अथवा यो विद्वान् भवतु सः (विद्यात्) जानीयात् (ब्रह्म) अ० १।८।४। सर्वेभ्यो बृहन्तं परमेश्वरम् (प्रत्यक्षम्) साक्षात्करेण (परूँषि) अर्तिपॄवपि०। उ० २।११७। पॄ पालनपूरणयोः−उसि। पालनसामर्थ्यानि (यस्य) ब्रह्मणः (संभाराः) विविधाः संग्रहाः (ऋचः) ऋच स्तुतौ−क्विप्। ऋग् वाङ्नाम-निघ० १।११। स्तुत्या वेदवाचः (यस्य) (अनूक्यम्) ऋहलोर्ण्यत्। पा० ३।१।१२४। अनु+वच परिभाषणे-ण्यत्, छान्दसं सम्प्रसारणम्, चजोः कु घिण्ण्यतोः। पा० ७।३।५२। इति कुत्वम्। अनुकूलवाक्यम् ॥

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