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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1240
ऋषिः - अम्बरीषो वार्षागिर ऋजिश्वा भारद्वाजश्च देवता - पवमानः सोमः छन्दः - अनुष्टुप् स्वरः - गान्धारः काण्ड नाम -
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प꣢रि꣣ स्य꣢ स्वा꣣नो꣡ अ꣢क्षर꣣दि꣢न्दु꣣र꣢व्ये꣣ म꣡द꣢च्युतः । धा꣢रा꣣ य꣢ ऊ꣣र्ध्वो꣡ अ꣢ध्व꣣रे꣢ भ्रा꣣जा꣡ न याति꣢꣯ गव्य꣣युः꣢ ॥१२४०॥

स्वर सहित पद पाठ

प꣡रि꣢꣯ । स्यः । स्वा꣣नः꣢ । अ꣣क्षरन् । इ꣡न्दुः꣢꣯ । अ꣡व्ये꣢꣯ । म꣡द꣢꣯च्युतः । म꣡द꣢꣯ । च्यु꣣तः । धा꣡रा꣢꣯ । यः । ऊ꣣र्ध्वः꣢ । अ꣣ध्वरे꣢ । भ्रा꣣जा꣢ । न । या꣡ति꣢꣯ । ग꣣व्ययुः꣢ ॥१२४०॥


स्वर रहित मन्त्र

परि स्य स्वानो अक्षरदिन्दुरव्ये मदच्युतः । धारा य ऊर्ध्वो अध्वरे भ्राजा न याति गव्ययुः ॥१२४०॥


स्वर रहित पद पाठ

परि । स्यः । स्वानः । अक्षरन् । इन्दुः । अव्ये । मदच्युतः । मद । च्युतः । धारा । यः । ऊर्ध्वः । अध्वरे । भ्राजा । न । याति । गव्ययुः ॥१२४०॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1240
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 16; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 9; खण्ड » 8; सूक्त » 2; मन्त्र » 3
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पदार्थ -
(स्यः) वह (स्वानः) अभिषुत किया जाता हुआ, (मदच्युतः) उत्साह देने के लिए निकला हुआ (इन्दुः) भिगोनेवाला आनन्द-रस वा ज्ञानरस (अव्ये) अव्यय अर्थात् अविनश्वर जीवात्मा में (परि अक्षरत्) परमात्मा के पास से वा आचार्य के पास से क्षरित हुआ है, (यः) जो (ऊर्ध्वः) उत्कृष्ट आनन्द-रस वा ज्ञान-रस (गव्ययुः) प्रकाश देने का इच्छुक-सा होकर (अध्वरे) उपासना-यज्ञ वा विद्या-यज्ञ में (भ्राजा धारा न) मानो प्रदीप्त धारा के साथ (याति) प्रवाहित हो रहा है ॥३॥ यहाँ उत्प्रेक्षा अलङ्कार है ॥३॥

भावार्थ - परमेश्वरोपासना-यज्ञ से परमानन्द-रस को और विद्या-यज्ञ से ज्ञान-रस को प्राप्त करके लोग दिव्य प्रकाश पाकर कृतार्थ होवें ॥३॥

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