Loading...

सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1319
ऋषिः - नृमेध आङ्गिरसः देवता - इन्द्रः छन्दः - बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती) स्वरः - मध्यमः काण्ड नाम -
6

श्रा꣡य꣢न्त इव꣣ सू꣢र्यं꣣ वि꣡श्वेदिन्द्र꣢꣯स्य भक्षत । व꣡सू꣢नि जा꣣तो꣡ जनि꣢꣯मा꣣न्यो꣡ज꣢सा꣣ प्र꣡ति꣢ भा꣣गं꣡ न दी꣢꣯धिमः ॥१३१९॥

स्वर सहित पद पाठ

श्रा꣡य꣢꣯न्तः । इ꣣व । सू꣡र्य꣢꣯म् । वि꣡श्वा꣢꣯ । इत् । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । भ꣣क्षत । व꣡सू꣢꣯नि । जा꣣तः꣢ । ज꣡नि꣢꣯मानि । ओ꣡ज꣢꣯सा । प्र꣡ति꣢꣯ । भा꣣ग꣢म् । न । दी꣣धिमः ॥१३१९॥


स्वर रहित मन्त्र

श्रायन्त इव सूर्यं विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत । वसूनि जातो जनिमान्योजसा प्रति भागं न दीधिमः ॥१३१९॥


स्वर रहित पद पाठ

श्रायन्तः । इव । सूर्यम् । विश्वा । इत् । इन्द्रस्य । भक्षत । वसूनि । जातः । जनिमानि । ओजसा । प्रति । भागम् । न । दीधिमः ॥१३१९॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1319
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 14; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 10; खण्ड » 10; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
Acknowledgment

पदार्थ -
(श्रायन्तः इव) भोजन आदि को पकाते हुए मनुष्य जैसे (सूर्यम्) सूर्य का उपयोग करते हैं, अर्थात् सौर चूल्हा बनाकर उस पर भोजन पकाते हैं, वैसे ही तुम (इन्द्रस्य) ऐश्वर्यशाली परमात्मा के, अर्थात् परमात्मा से उत्पन्न किये हुए (विश्वा इत् वसूनि) जल, अग्नि, बिजली, वायु, ओषधि आदि सभी धनों को (भक्षत) यथायोग्य सेवन करो। (जातः) वह प्रसिद्ध परमात्मा (ओजसा) अपने प्रताप से (जनिमानि) सभी उत्पन्न वस्तुओं को धारण करताहै। हम उसका (प्रति दीधिमः) ध्यान करते हैं, (भागं न) जैसे कोई अपने प्राप्तव्य दायभाग का ध्यान करता है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥

भावार्थ - जैसे सूर्य हमारे लिए प्राणों का स्रोत है, वैसे ही परमेश्वर से रचे हुए सभी पदार्थ अत्यधिक हितकर हैं। उनका यथायोग्य उपयोग सबको करना चाहिए ॥१॥

इस भाष्य को एडिट करें
Top