Sidebar
सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1543
ऋषिः - विरूप आङ्गिरसः
देवता - अग्निः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
4
म꣣न्द्र꣡ꣳ होता꣢꣯रमृ꣣त्वि꣡जं꣢ चि꣣त्र꣡भा꣢नुं वि꣣भा꣡व꣢सुम् । अ꣣ग्नि꣡मी꣢डे꣣ स꣡ उ꣢ श्रवत् ॥१५४३॥
स्वर सहित पद पाठमन्द्र꣢म् । हो꣡ता꣢꣯रम् । ऋ꣣त्वि꣡ज꣢म् । चि꣣त्र꣡भा꣢नुम् । चि꣣त्र꣢ । भा꣣नुम् । विभा꣡व꣢सुम् । वि꣣भा꣢ । व꣣सुम् । अग्नि꣢म् । ई꣣डे । सः꣢ । उ꣣ । श्रवत् ॥१५४३॥
स्वर रहित मन्त्र
मन्द्रꣳ होतारमृत्विजं चित्रभानुं विभावसुम् । अग्निमीडे स उ श्रवत् ॥१५४३॥
स्वर रहित पद पाठ
मन्द्रम् । होतारम् । ऋत्विजम् । चित्रभानुम् । चित्र । भानुम् । विभावसुम् । विभा । वसुम् । अग्निम् । ईडे । सः । उ । श्रवत् ॥१५४३॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1543
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 7; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 15; खण्ड » 1; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
Acknowledgment
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 7; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 15; खण्ड » 1; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
Acknowledgment
विषय - अब परमात्मा के गुणों का वर्णन करते हैं।
पदार्थ -
(मन्द्रम्) आनन्दमय, (होतारम्) सब पदार्थों के दाता, (ऋत्विजम्) ऋतुओं में सामञ्जस्य स्थापित करनेवाले अथवा प्रत्येक ऋतु में पूजनीय, (चित्रभानुम्) बहुरंगे सूर्य के रचयिता, (विभावसुम्) तेज रूप धन के धनी (अग्निम्) अग्रनेता जगदीश्वर की (ईडे) मैं स्तुति करता हूँ, वा उससे प्रार्थना करता हूँ। (सः उ) वह मेरी स्तुति वा प्रार्थना को (श्रवत्) सुने ॥३॥
भावार्थ - जो सच्चिदानन्दस्वरूप, सकलसृष्टि का रचयिता, सारे ऋतुचक्र को चलानेवाला, तेजस्वी परमेश्वर है, उसकी सब मनुष्यों को प्रेम से वन्दना करनी चाहिए ॥३॥
इस भाष्य को एडिट करें