Sidebar
सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1583
ऋषिः - सौभरि: काण्व:
देवता - अग्निः
छन्दः - बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)
स्वरः - मध्यमः
काण्ड नाम -
3
यो꣢꣫ विश्वा꣣ द꣡य꣢ते꣣ व꣢सु꣣ हो꣡ता꣢ म꣣न्द्रो꣡ जना꣢꣯नाम् । म꣢धो꣣र्न꣡ पात्रा꣢꣯ प्रथ꣣मा꣡न्य꣢स्मै꣣ प्र꣡ स्तोमा꣢꣯ यन्त्व꣣ग्न꣡ये꣢ ॥१५८३॥
स्वर सहित पद पाठयः꣢ । वि꣡श्वा꣢꣯ । द꣡य꣢꣯ते । व꣡सु꣢꣯ । हो꣡ता꣢꣯ । म꣣न्द्रः꣢ । ज꣡ना꣢꣯नाम् । म꣡धोः꣢꣯ । न । पा꣡त्रा꣢꣯ । प्र꣣थमा꣡नि꣢ । अ꣣स्मै । प्र꣢ । स्तो꣡माः꣢꣯ । य꣣न्तु । अग्न꣡ये꣢ ॥१५८३॥
स्वर रहित मन्त्र
यो विश्वा दयते वसु होता मन्द्रो जनानाम् । मधोर्न पात्रा प्रथमान्यस्मै प्र स्तोमा यन्त्वग्नये ॥१५८३॥
स्वर रहित पद पाठ
यः । विश्वा । दयते । वसु । होता । मन्द्रः । जनानाम् । मधोः । न । पात्रा । प्रथमानि । अस्मै । प्र । स्तोमाः । यन्तु । अग्नये ॥१५८३॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1583
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 7; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 5; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 16; खण्ड » 1; सूक्त » 5; मन्त्र » 1
Acknowledgment
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 7; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 5; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 16; खण्ड » 1; सूक्त » 5; मन्त्र » 1
Acknowledgment
विषय - प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ४४ क्रमाङ्क पर परमात्मा की स्तुति के विषय में की जा चुकी है। यहाँ एक-साथ परमात्मा और आचार्य दोनों को लक्ष्य करके कहते हैं।
पदार्थ -
(होता) ब्रह्माण्ड-यज्ञ वा शिक्षा-यज्ञ का कर्ता, (जनानाम्) मनुष्यों को (मन्द्रः) आनन्द देनेवाला (यः) जो परमात्मा वा आचार्य (विश्वा वसु) सब आध्यात्मिक धनों को वा विद्या-धनों को (ददाति) देता है, (अस्मै अग्नये) ऐसे अग्रनायक परमात्मा वा आचार्य के लिए (प्रथमानि) श्रेष्ठ (मधोः पात्रा न) मधुपूर्ण पात्रों के समान (स्तोमाः) धन्यवाद के वचन (प्र यन्तु) पहुँचें ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थ - जैसे परमेश्वर पुरुषार्थी को भौतिक और आध्यात्मिक धन प्रदान करता है, वैसे ही आचार्य शिष्यों को विद्या-धन देता है, इसलिए वे दोनों सबके द्वारा अभिनन्दन करने योग्य हैं ॥१॥
इस भाष्य को एडिट करें