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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1000
ऋषिः - असितः काश्यपो देवलो वा
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
3
वृ꣡षा꣢ पुना꣣न꣡ आयू꣢꣯ꣳषि स्त꣣न꣢य꣣न्न꣡धि꣢ ब꣣र्हि꣡षि꣢ । ह꣢रिः꣣ स꣢꣫न्योनि꣣मा꣡स꣢दः ॥१०००॥
स्वर सहित पद पाठवृ꣡षा꣢꣯ । पु꣣नानः꣢ । आ꣡यू꣢꣯ꣳषि । स्त꣣न꣡य꣢न् । अ꣡धि꣢꣯ । ब꣣र्हि꣡षि꣢ । ह꣡रिः꣢꣯ । सन् । यो꣡नि꣢꣯म् । आ । अ꣣सदः ॥१०००॥
स्वर रहित मन्त्र
वृषा पुनान आयूꣳषि स्तनयन्नधि बर्हिषि । हरिः सन्योनिमासदः ॥१०००॥
स्वर रहित पद पाठ
वृषा । पुनानः । आयूꣳषि । स्तनयन् । अधि । बर्हिषि । हरिः । सन् । योनिम् । आ । असदः ॥१०००॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1000
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 13; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 4; सूक्त » 3; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 13; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 4; सूक्त » 3; मन्त्र » 2
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विषय - वासना-शून्य हृदय में
पदार्थ -
हे सोम! आप १. (वृषा) = शक्तिशाली हो अथवा सब सुखों का वर्षण करनेवाले हो । २. आप (आयूंषि) = हमारे जीवनों को (पुनान:) = पवित्र करते हो । प्रभु-स्मरण हमें वासनाओं से बचाता ही है। ३. आप (अधिबर्हिषि) = वासनाओं से शून्य किये गये हृदयान्तरिक्ष में (स्तनयन्) = गर्जते हो । प्रभु की वेदवाणी वासनाशून्य हृदय में सुनाई पड़ती है । ५. हे प्रभो ! (हरिः सन्) = सब दुःखों व मलों के हरण करनेवाले होते हुए, ६. (योनिम्) = अन्त:करणरूप गृह में (आसदः) = आसीन होओ।
भावार्थ -
प्रभु की वाणी वासनाशून्य हृदय में सुनाई पड़ती है।
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