Sidebar
सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1006
ऋषिः - गोतमो राहूगणः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - पङ्क्तिः
स्वरः - पञ्चमः
काण्ड नाम -
3
ता꣡ अ꣢स्य पृशना꣣यु꣢वः꣣ सो꣡म꣢ꣳ श्रीणन्ति꣣ पृ꣡श्न꣢यः । प्रि꣣या꣡ इन्द्र꣢꣯स्य धे꣣न꣢वो꣣ व꣡ज्र꣢ꣳ हिन्वन्ति꣣ सा꣡य꣢कं꣣ व꣢स्वी꣣र꣡नु꣢ स्व꣣रा꣡ज्य꣢म् ॥१००६॥
स्वर सहित पद पाठताः । अ꣣स्य । पृशनायु꣡वः꣢ । सो꣡म꣢꣯म् । श्री꣣णन्ति । पृ꣡श्न꣢꣯यः । प्रि꣣याः꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । धे꣣न꣡वः꣢ । व꣡ज्र꣢꣯म् । हि꣣न्वन्ति । सा꣡य꣢꣯कम् । व꣡स्वीः꣢꣯ । अ꣡नु꣢꣯ । स्व꣣रा꣡ज्य꣢म् । स्व꣣ । रा꣡ज्य꣢꣯म् ॥१००६॥
स्वर रहित मन्त्र
ता अस्य पृशनायुवः सोमꣳ श्रीणन्ति पृश्नयः । प्रिया इन्द्रस्य धेनवो वज्रꣳ हिन्वन्ति सायकं वस्वीरनु स्वराज्यम् ॥१००६॥
स्वर रहित पद पाठ
ताः । अस्य । पृशनायुवः । सोमम् । श्रीणन्ति । पृश्नयः । प्रियाः । इन्द्रस्य । धेनवः । वज्रम् । हिन्वन्ति । सायकम् । वस्वीः । अनु । स्वराज्यम् । स्व । राज्यम् ॥१००६॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1006
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 15; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 5; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
Acknowledgment
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 15; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 5; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
Acknowledgment
विषय - वेदवाणी कैसी है ? क्या करती है ?
पदार्थ -
(ताः) = वे (अस्य) = इन जीव के, प्रभु के साथ (पृशनायुवः) = [पृशनं=clinging to] सम्पर्क करनेवाली (पृश्नयः) = [संस्पृष्टो भासा] ज्ञान की ज्योति से युक्त (इन्द्रस्य प्रिया:) = जितेन्द्रिय पुरुष को प्रीणत करनेवाली (वस्वीः) = उत्तम निवास की कारणभूत (धेनवः) = वेदवाणीरूप गौएँ (स्वराज्यम् अनु) = स्वराज्य का लक्ष्य करके (सोमं श्रीणन्ति) = सोम का परिपाक करती हैं और (सायकम्) = [षो अन्तकर्मणि] फल-प्राप्ति तक न समाप्त होनेवाली (वज्रम्) = क्रियाशीलता की (हिन्वन्ति) = प्रेरणा देती हैं।
प्रस्तुत मन्त्र में वेदवाणी का स्वरूप निम्न शब्दों में दर्शाया गया है – ये हमारे शरीर में सोम का परिपाक करती हैं। वेद-स्वाध्याय सोम का शरीर में ही खपत कर देता है, क्योंकि उस समय यह सोम ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है । २. इन वेदवाणियों से हमें क्रियाशीलता की प्रेरणा मिलती हैयह क्रियाशीलता फल-प्राप्ति में ही पर्यवसन्न होती है। यह फल-प्राप्ति 'स्वराज्यमनु' शब्दों से सूचित हो रही है।‘स्वराज्य'=मोक्ष-प्राप्ति – इन्द्रियों की दासता से छुटकारा ही मानव-जीवन का लक्ष्य है।
भावार्थ -
हम वेद को अपनाएँ । यह हमारे जीवन को ज्योतिर्मय बनाएगा और प्रभु से हमारा मेल कराएगा। इन्हें अपनाने से हम उत्तम वेदवाणीरूप गौवोंवाले होंगे–‘गोतम' बनेंगे और वासनाओं को त्यागनेवाले ‘राहूगण' होंगे ।