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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1009
ऋषिः - जमदग्निर्भार्गवः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
4
शु꣣भ्र꣡मन्धो꣢꣯ दे꣣व꣡वा꣢तम꣣प्सु꣢ धौ꣣तं꣡ नृभिः꣢꣯ सु꣣त꣢म् । स्व꣡द꣢न्ति꣣ गा꣢वः꣣ प꣡यो꣢भिः ॥१००९॥
स्वर सहित पद पाठशु꣣भ्र꣢म् । अ꣡न्धः꣢꣯ । दे꣣व꣡वा꣢तम् । दे꣣व꣢ । वा꣣तम् । अप्सु꣢ । धौ꣣त꣢म् । नृ꣡भिः꣢꣯ । सु꣣त꣢म् । स्व꣡द꣢꣯न्ति । गा꣡वः꣢꣯ । प꣡यो꣢꣯भिः ॥१००९॥
स्वर रहित मन्त्र
शुभ्रमन्धो देववातमप्सु धौतं नृभिः सुतम् । स्वदन्ति गावः पयोभिः ॥१००९॥
स्वर रहित पद पाठ
शुभ्रम् । अन्धः । देववातम् । देव । वातम् । अप्सु । धौतम् । नृभिः । सुतम् । स्वदन्ति । गावः । पयोभिः ॥१००९॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1009
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 16; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 6; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 16; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 6; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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विषय - सोम द्वारा गौवों का आप्यायन
पदार्थ -
शरीर में उत्पन्न सोम को 'अन्धः' कहते हैं, क्योंकि यह आध्यायनीय – अत्यन्त ध्यान देने योग्य होता है। यह (अन्धः) = सोम १. (शुभ्रम्) = शरीर को शोभा प्राप्त करानेवाला है। शरीर की सारी कान्ति इस सोम पर ही निर्भर करती है । २. यह (देववातम्) = [देवानां वातं यस्मात्] दिव्य गुणों को हममें प्रेरित करनेवाला है। सोम की रक्षा से हममें दिव्य गुणों की वृद्धि होती है । ३. (अप्सु) = कर्मों में (धौतम्) = यह शुद्ध किया जाता है, जब तक मनुष्य कर्मों में लगा रहता है तब तक उसका यह सोम पवित्र बना रहता है, क्योंकि न वासना उत्पन्न होती है और न ही यह मलिन होता है। एवं, कर्मों में लगे रहना ‘सोम-रक्षा' का साधन हो जाता है । ४. (नृभिः सुतम्) = यह सोम अपने को उन्नति-पथ पर ले-चलनेवालों के हेतु से उत्पन्न किया गया है, अर्थात् शरीर में इसकी उत्पत्ति इसी उद्देश्य से की गयी है कि मनुष्य उन्नत हो सके । इस सोम को (गावः) = ज्ञानेन्द्रियाँ (पयोभिः) = आप्यायन के हेतु से स्वदन्ति= खाती हैं । यह सोम सब इन्द्रियों की शक्ति की वृद्धि का हेतु है ।
भावार्थ -
सोमरक्षा द्वारा हम सब इन्द्रियों की शक्ति का विकास करें।
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