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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1039
ऋषिः - मेधातिथिः काण्वः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
2
अ꣡धु꣢क्षत प्रि꣣यं꣢꣫ मधु꣣ धा꣡रा꣢ सु꣣त꣡स्य꣢ वे꣣ध꣡सः꣢ । अ꣣पो꣡ व꣢सिष्ट सु꣣क्र꣡तुः꣢ ॥१०३९॥
स्वर सहित पद पाठअ꣡धु꣢꣯क्षत । प्रि꣡य꣢म् । म꣡धु꣢꣯ । धा꣡रा꣢꣯ । सु꣣त꣡स्य꣢ । वे꣣ध꣡सः꣢ । अ꣣पः꣢ । व꣣सिष्ट । सुक्र꣡तुः꣢ । सु꣣ । क्र꣡तुः꣢꣯ ॥१०३९॥
स्वर रहित मन्त्र
अधुक्षत प्रियं मधु धारा सुतस्य वेधसः । अपो वसिष्ट सुक्रतुः ॥१०३९॥
स्वर रहित पद पाठ
अधुक्षत । प्रियम् । मधु । धारा । सुतस्य । वेधसः । अपः । वसिष्ट । सुक्रतुः । सु । क्रतुः ॥१०३९॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1039
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 7; खण्ड » 1; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 7; खण्ड » 1; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
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विषय - प्रिय मधु का दोहन
पदार्थ -
‘वेधस्’ सोम का नाम है, क्योंकि शरीर में सब शक्तियों का कर्त्ता [creater] यही है । (सुतस्य वेधसः) = उत्पन्न हुए-हुए सोम की (धारा) = धारणशक्ति (प्रियं मधु) = प्रिय मधु को- तृप्त करनेवाले माधुर्य को (अधुक्षत) = शरीर में दूहती है, अर्थात् जब मनुष्य इस सोम की शरीर में रक्षा करता है तब यह सोम उसके जीवन में माधुर्य का प्रपूरण कर देता है। ('भूयासं मधु सन्दृशः') = इस प्रार्थना को क्रियान्वित करने के लिए आवश्यक है कि हम सोम को अपने में सुरक्षित करें। यह सोम का रक्षक (सुक्रतुः) = उत्तम सङ्कल्पों व प्रज्ञानोंवाला होकर (अप:) = कर्मों को (वसिष्ट) = धारण करता है। सोमी पुरुष का ज्ञान उत्तम होता है—इसके सङ्कल्प उत्तम होते हैं और यह सदा उत्तम कर्मों में व्याप्त रहता है ।
भावार्थ -
सोमरक्षा मुझे मधुर जीवनवाला बनाता है, इससे मैं उत्तम सङ्कल्पों व ज्ञानवाला बनता हूँ, क्रियाशील होता हूँ ।
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