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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1049
ऋषिः - हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
1
स꣢ना꣣ द꣡क्ष꣢मु꣣त꣢꣫ क्रतु꣣म꣡प꣢ सोम꣣ मृ꣡धो꣢ जहि । अ꣡था꣢ नो꣣ व꣡स्य꣢सस्कृधि ॥१०४९॥
स्वर सहित पद पाठस꣡न꣢꣯ । द꣡क्ष꣢꣯म् । उ꣣त꣢ । क्र꣡तु꣢꣯म् । अ꣡प꣢꣯ । सो꣣म । मृ꣡धः꣢꣯ । ज꣣हि । अ꣡थ꣢꣯ । नः꣣ । व꣡स्य꣢꣯सः । कृ꣣धि ॥१०४९॥
स्वर रहित मन्त्र
सना दक्षमुत क्रतुमप सोम मृधो जहि । अथा नो वस्यसस्कृधि ॥१०४९॥
स्वर रहित पद पाठ
सन । दक्षम् । उत । क्रतुम् । अप । सोम । मृधः । जहि । अथ । नः । वस्यसः । कृधि ॥१०४९॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1049
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 4; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 7; खण्ड » 2; सूक्त » 1; मन्त्र » 3
Acknowledgment
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 4; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 7; खण्ड » 2; सूक्त » 1; मन्त्र » 3
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विषय - दक्ष-क्रतु-कामसंहार
पदार्थ -
१ हे (सोम) = प्रभो! हमें (दक्षम्) = बल (सना) = प्राप्त कराइए । दक्ष शब्द में मानस शक्ति [ Mental power] योग्यता [ability], दृढ़निश्चय [resoluteness] व शक्ति [Strength] की भावना अन्तर्निहित है। प्रभुकृपा से हमें यह 'मानसबल, योग्यता, दृढ़निश्चय व शक्ति' प्राप्त हो । २. (उत) = और क्रतुम् [Intelligence, deliberation, Inspiration; Enlightenment] बुद्धि, विचार, प्रेरणा व
प्रकाश (सना) = दीजिए । (क्रतुम्) = हम प्रत्येक कार्य को योग्यता से करनेवाले हों [Efficiency]। हमारा प्रत्येक कार्य सोद्देश्य हो [ plan, design, purpose]। हम अपने कर्मों को दृढ़-सङ्कल्प के साथ करें [Resolution]। हमारा प्रत्येक कार्य प्रभु चरणों में अर्पित हो [offering worship]। हम अपने पवित्र कर्मों से प्रभु की उपासना कर रहे हों । ३. हे सोम ! आप (मृधः) = हमारे कामादि शत्रुओं को (अपजहि) = हमसे सुदूर नष्ट कीजिए । कामादि शत्रुओं के संहार से (अथ) = अब (नः) = हमें (वस्यसः) = उत्तम जीवनवाला (कृधि) = कीजिए ।
भावार्थ -
सोम के द्वारा हमें दक्षता प्राप्त हो, हम क्रतुमय जीवनवाले हों- कामादि का संहार कर जीवन को सुन्दर बनाएँ ।
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