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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1139
ऋषिः - भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्भार्गवो वा देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
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आ꣢ र꣣यि꣡मा सु꣢꣯चे꣣तु꣢न꣣मा꣡ सु꣢क्रतो त꣣नू꣢ष्वा । पा꣢न्त꣣मा꣡ पु꣢रु꣣स्पृ꣡ह꣢म् ॥११३९॥

स्वर सहित पद पाठ

आ । र꣣यि꣢म् । आ । सु꣣चेतु꣡न꣢म् । सु꣣ । चेतु꣡न꣢म् । आ । सु꣣क्रतो । सु । क्रतो । तनू꣡षु꣢ । आ । पा꣡न्त꣢꣯म् । आ । पु꣣रुस्पृ꣡ह꣢म् । पु꣣रु । स्पृ꣡ह꣢꣯म् ॥११३९॥


स्वर रहित मन्त्र

आ रयिमा सुचेतुनमा सुक्रतो तनूष्वा । पान्तमा पुरुस्पृहम् ॥११३९॥


स्वर रहित पद पाठ

आ । रयिम् । आ । सुचेतुनम् । सु । चेतुनम् । आ । सुक्रतो । सु । क्रतो । तनूषु । आ । पान्तम् । आ । पुरुस्पृहम् । पुरु । स्पृहम् ॥११३९॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1139
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 2; मन्त्र » 12
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 8; खण्ड » 2; सूक्त » 1; मन्त्र » 12
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पदार्थ -

१. हे (सुक्रतो) = शोभनज्ञान प्रभो ! हम आपके उस सोम का (आवृणीमहे) = वरण करते हैं जो (रयिम्) = वस्तुतः शरीर का धन है । इसके होने से ही शरीर है, इसके अभाव में शरीर भी नहीं है । २. (सुचेतुनम्) = जो हमारे ज्ञान को उत्तम करनेवाला है, बुद्धि को सूक्ष्म बनाता है, (पान्तम्-ह) = हमारी रक्षा करता है, हमारे मनों पर आसुर वृत्तियों का उसी प्रकार आक्रमण नहीं होने देता जैसे शरीर पर रोगों का । ४. (पुरुस्पृहम्) = यह सोम सचमुच महान् स्पृहा को जन्म देकर हमें महान् बनाता है। हे प्रभो! हम इस सोम को (तनूषु) = अपने शरीरों में (आवृणीमहे) = वरते हैं । 'तनू’ का अर्थ सन्तति लें तो अर्थ यह होगा कि इसे हम अपनी सन्तानों के लिए भी वरते हैं ।

भावार्थ -

सोम ही वास्तविक शरीर-धन है ।

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