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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1226
ऋषिः - उचथ्य आङ्गिरसः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
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त꣢व꣣ त्य꣡ इ꣢न्दो꣣ अ꣡न्ध꣢सो दे꣣वा꣢꣫ मधो꣣꣬र्व्या꣢꣯शत । प꣡व꣢मानस्य म꣣रु꣡तः꣢ ॥१२२६॥

स्वर सहित पद पाठ

त꣡व꣢꣯ । त्ये । इ꣣न्दो । अ꣡न्ध꣢꣯सः । दे꣣वाः꣢ । म꣡धोः꣢꣯ । वि । आ꣣शत । प꣡व꣢꣯मानस्य । म꣣रु꣡तः꣢ ॥१२२६॥


स्वर रहित मन्त्र

तव त्य इन्दो अन्धसो देवा मधोर्व्याशत । पवमानस्य मरुतः ॥१२२६॥


स्वर रहित पद पाठ

तव । त्ये । इन्दो । अन्धसः । देवाः । मधोः । वि । आशत । पवमानस्य । मरुतः ॥१२२६॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1226
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 11; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 9; खण्ड » 7; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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पदार्थ -

हे (इन्दो) = सर्वशक्तिमान् प्रभो ! (तव) = आपके - आपके द्वारा शरीर में रस-रुधिरादि क्रम से उत्पन्न किये गये (अन्धसः) = अत्यन्त ध्यान करने योग्य आध्यायनीय सोम का जो (मधोः) = अत्यन्त मधुर हैजीवन में माधुर्य का संचार करनेवाला है और (पवमानस्य) = जीवन को पवित्र करनेवाला है, रोगादि के कृमियों का संहार करके शरीर को नीरोग बनानेवाला है तथा मन से द्वेषादि को दूर करके मन को पवित्र करनेवाला है, उस सोम का (त्ये) = वे लोग (व्याशत) = शरीर में [अश् व्याप्तौ] व्यापन करते हैं जो १. (देवा:) = दिव्य गुणों को प्राप्त करने के प्रयत्न में लगे हैं – ज्ञान की ज्योति से अपने को दीप्त करने का ध्यान करते हैं, तथा २. (मरुतः) = जो प्राणसाधना में लगे हुए हैं ।

दिव्य गुणों की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील, प्राणसाधना में तत्पर ये लोग प्रभु का गायन करने से ‘उचथ्य' कहलाते हंय और व्यसनों का शिकार न होने से शक्तिशाली बने रहने से 'आङ्गिरस' होते हैं ।

भावार्थ -

हम सोम का शरीर में ही व्यापन करेंगे तो यह हमारे जीवन को मधुर बनाएगा और हमारे मानस को पवित्र करेगा। सोम का शरीर में व्यापन तब होगा जब हम देव बनने का प्रयत्न करेंगे और प्राणसाधना को अपनाएँगे ।

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