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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1245
ऋषिः - उशना काव्यः
देवता - अग्निः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
3
क꣣वि꣡मि꣢व प्र꣣श꣢ꣳस्यं꣣ यं꣢ दे꣣वा꣢स꣣ इ꣡ति꣢ द्वि꣣ता꣢ । नि꣡ मर्त्ये꣢꣯ष्वाद꣣धुः꣢ ॥१२४५॥
स्वर सहित पद पाठक꣣वि꣢म् । इ꣣व । प्रश꣡ꣳस्य꣢म् । प्र꣣ । श꣡ꣳस्य꣢꣯म् । यम् । दे꣣वा꣡सः꣢ । इ꣡ति꣢꣯ । द्वि꣣ता꣢ । नि । म꣡र्त्ये꣢꣯षु । आ꣡दधुः꣢ । आ꣣ । दधुः꣢ ॥१२४५॥
स्वर रहित मन्त्र
कविमिव प्रशꣳस्यं यं देवास इति द्विता । नि मर्त्येष्वादधुः ॥१२४५॥
स्वर रहित पद पाठ
कविम् । इव । प्रशꣳस्यम् । प्र । शꣳस्यम् । यम् । देवासः । इति । द्विता । नि । मर्त्येषु । आदधुः । आ । दधुः ॥१२४५॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1245
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 18; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 9; खण्ड » 9; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 18; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 9; खण्ड » 9; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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विषय - दो रूपों में
पदार्थ -
पिछले मन्त्र से 'स्तुषे' क्रिया को लाकर अर्थ इस प्रकार है कि मैं उस प्रभु का स्तवन करता हूँ (यम्) = जिसको (देवाः) = देवलोग १. (कविम् इव) = कवि की भाँति – हृदयस्थ रूपेण सब विद्याओं का उपदेश देनेवाले के रूप में [कौति सर्वा विद्याः] अथवा क्रान्तदर्शी अन्तर्यामी के रूप में तथा २. (प्रशंस्यम्) = प्रशंसा योग्य सब बातों के बीजरूप में जो-जो भी हमारे जीवन में सौन्दर्य का अंश है सब उस प्रभु के ही अंश के कारण है, (इति) = इस प्रकार (द्विता) = दो रूपों में (मर्त्येषु) = मनुष्यों में (नि आ दधुः) = निश्चय से स्थापित करते हैं।
विद्वान् लोग मनुष्यों में प्रभु को दो रूपों में देखते हैं एक तो 'कवि' के रूप में और दूसरा ‘प्रशंस्य’ रूप में। सब विद्याओं का ज्ञान देनेवाला वही अन्तर्यामी प्रभु है, वही हमारे जीवनों में सौंन्दर्यमात्र का बीज है ।
भावार्थ -
वे प्रभु 'कवि' हैं, 'प्रशंस्य' हैं ।
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