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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1249
ऋषिः - नृमेध आङ्गिरसः देवता - इन्द्रः छन्दः - उष्णिक् स्वरः - ऋषभः काण्ड नाम -
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त्व꣡ꣳ हि शश्व꣢꣯तीना꣣मि꣡न्द्र꣢ ध꣣र्त्ता꣢ पु꣣रा꣡मसि꣢꣯ । ह꣣न्ता꣢꣫ दस्यो꣣र्म꣡नो꣢र्वृ꣣धः꣡ पति꣢꣯र्दि꣣वः꣢ ॥१२४९॥

स्वर सहित पद पाठ

त्वम् । हि । श꣡श्व꣢꣯तीनाम् । इ꣡न्द्र꣢꣯ । ध꣣र्त्ता꣢ । पु꣣रा꣢म् । अ꣡सि꣢꣯ । ह꣣न्ता꣢ । द꣡स्योः꣢꣯ । म꣡नोः꣢꣯ । वृ꣡धः꣢꣯ । प꣡तिः꣢꣯ । दि꣣वः꣢ ॥१२४९॥


स्वर रहित मन्त्र

त्वꣳ हि शश्वतीनामिन्द्र धर्त्ता पुरामसि । हन्ता दस्योर्मनोर्वृधः पतिर्दिवः ॥१२४९॥


स्वर रहित पद पाठ

त्वम् । हि । शश्वतीनाम् । इन्द्र । धर्त्ता । पुराम् । असि । हन्ता । दस्योः । मनोः । वृधः । पतिः । दिवः ॥१२४९॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1249
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 19; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 9; खण्ड » 9; सूक्त » 2; मन्त्र » 3
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पदार्थ -

मनुष्य पञ्चकोशों से बने शरीररूप नगरों में सदा से निवास करता आया है - अनादिकाल से उसे कर्मानुसार इनमें बँधना पड़ता रहा है, परन्तु आज यह ‘नृमेध'=लोकयज्ञ करनेवाला बनकर इन बन्धनों को तोड़ पाया है। प्रभु इससे कहते हैं—१. हे (इन्द्र) = इन्द्रियों के अधिष्ठाता! (त्वं हि) = तू निश्चय से (शश्वतीनां पुराम्) = इन सनातन काल से चली आ रही नगरियों का (धर्ता) = दर्ता – धारण व विदारण करनेवाला बना है । २. तू (दस्योः हन्ता) = अपने में दस्यु का [अकर्मा दस्युरभि नो अमन्तुरन्यव्रतो अमानुषः ] अकर्मण्यता, नास्तिकता, अशास्त्रीयकर्मता व निर्दयता का नाश करनेवाला है । ३. तू (मनो: वृधः) = अपने अन्दर ज्ञान को बढ़ानेवाला है तथा ४. (पति: दिव:) = दिव्यता का रक्षक है। ऐसा बनकर ही तो हम अपने इस जीवनकाल में इन शरीरों का उत्तम धारण करनेवाले बनते हैं [धर्ता] और इस शरीर की समाप्ति पर फिर जन्म न लेने के कारण इन शरीरों का विदारण करनेवाले होते हैं [दर्ता] |

भावार्थ -

हम इस मानव जीवन को दस्युता शून्य, ज्ञानवृद्ध, दिव्यता से पूर्ण बनाएँ, जिससे फिर जन्म न लेना पड़े ।

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