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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1274
ऋषिः - राहूगण आङ्गिरसः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
4
ए꣣ष꣢ उ꣣ स्य꣢꣫ वृषा꣣ र꣢꣫थोऽव्या꣣ वारे꣡भि꣢रव्यत । ग꣢च्छ꣣न्वा꣡ज꣢ꣳ सह꣣स्रि꣡ण꣢म् ॥१२७४॥
स्वर सहित पद पाठए꣣षः꣢ । उ꣣ । स्यः꣢ । वृ꣡षा꣢꣯ । र꣡थः꣢꣯ । अ꣡व्याः꣢꣯ । वा꣡रे꣢꣯भिः । अ꣣व्यत । ग꣡च्छ꣢꣯न् । वा꣡ज꣢꣯म् । स꣣हस्रि꣡ण꣢म् ॥१२७४॥
स्वर रहित मन्त्र
एष उ स्य वृषा रथोऽव्या वारेभिरव्यत । गच्छन्वाजꣳ सहस्रिणम् ॥१२७४॥
स्वर रहित पद पाठ
एषः । उ । स्यः । वृषा । रथः । अव्याः । वारेभिः । अव्यत । गच्छन् । वाजम् । सहस्रिणम् ॥१२७४॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1274
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 4; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 10; खण्ड » 3; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 4; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 10; खण्ड » 3; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
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विषय - ‘हिताशी हो' राहूगण, आङ्गिरस
पदार्थ -
इस संसार में जो व्यक्ति प्रभु की ओर चलता है (उ) = निश्चय से (स्यः) = वह व्यक्ति (वृषा) = शक्तिशाली बनता है, २. (रथः) = रमणीय स्वरूपवाला होता है, [ऋ० १.५८.३ द०], ३. (अव्याः) = पृथिवी के [अवि—पृथिवी – शत० ६.१.२.३३] (वारेभिः) = वरणीय पदार्थों से (अव्यत) = सुरक्षित किया जाता है। यह पृथिवी उत्पन्न वरणीय पदार्थों का ही सेवन करता है, परिणामतः इसका स्वास्थ्य ठीक बना रहता है, इसका शरीर शक्तिशाली होता है और स्वरूप रमणीय । यह शक्तिशाली, रमणीय स्वरूपवाला व्यक्ति ‘आङ्गिरस'=अङ्ग-अङ्ग में रसवाला, एक-एक अङ्ग में शक्तिवाला होता है, क्योंकि यह वरणीय पदार्थों का ही सेवन करता है, अन्य पदार्थों को त्याग देता है, अत: 'राहूगण' = त्यागियों में गिना जानेवाला कहलाता है। यह स्वादवश त्याज्य पदार्थों का सेवन नहीं करता, इसीलिए यह (सहस्त्रिणम्) = सहस्र पुरुषों के (वाजम्) = बल को (गच्छन्) = प्राप्त होता है [शतृ-लट्; गच्छति] । इसके शरीर की शक्ति सदा ठीक बनी रहती है ।
भावार्थ -
अनन्त, अक्षीण बल को प्राप्त करने के लिए हम हितकर पदार्थों का ही सेवन करें।
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