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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1276
ऋषिः - राहूगण आङ्गिरसः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
2
ए꣣ष꣡ स्य मानु꣢꣯षी꣣ष्वा꣢ श्ये꣣नो꣢꣫ न वि꣣क्षु꣡ सी꣢दति । ग꣡च्छ꣢ञ्जा꣣रो꣢꣫ न यो꣣षि꣡त꣢म् ॥१२७६॥
स्वर सहित पद पाठए꣣षः꣢ । स्यः । मा꣡नु꣢꣯षीषु । आ । श्ये꣣नः꣢ । न । वि꣣क्षु꣢ । सी꣣दति । ग꣡च्छ꣢꣯न् । जा꣣रः꣢ । न । यो꣣षि꣡त꣢म् ॥१२७६॥
स्वर रहित मन्त्र
एष स्य मानुषीष्वा श्येनो न विक्षु सीदति । गच्छञ्जारो न योषितम् ॥१२७६॥
स्वर रहित पद पाठ
एषः । स्यः । मानुषीषु । आ । श्येनः । न । विक्षु । सीदति । गच्छन् । जारः । न । योषितम् ॥१२७६॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1276
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 4; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 10; खण्ड » 3; सूक्त » 1; मन्त्र » 3
Acknowledgment
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 4; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 10; खण्ड » 3; सूक्त » 1; मन्त्र » 3
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विषय - यह मानव से प्रेम करता है
पदार्थ -
(एषः स्यः) = दृढ़-सङ्कल्प द्वारा प्रभु को प्राप्त करनेवाला यह भक्त (मानुषीषु विक्षु) = मानव प्रजाओं में (श्येन: न:) = बड़ी शंसनीय गतिवाला होकर (आसीदति) = विराजमान होता है । यह अपने ही आनन्द के लिए किसी पर्वत-कन्दरा में एकान्त स्थान नहीं ढूँढता । यह मनुष्यों में ही विचरता है। वहाँ रहते हुए यह सदा क्रियाशील बनता है, लोकहित में लगा रहता है और इसकी ये सब क्रियाएँ अत्यन्त प्रशस्त होती हैं ।
यह मानव प्रजा को इस प्रकार (गच्छन्) = जानेवाला – प्राप्त होनेवाला होता है (न) = जैसे (जार:) = एक प्रेमी [Lover] (योषितम्) = अपनी प्रेमिका स्त्री को प्राप्त होता है । अथवा (जारः) = जरिता=स्तोता (न) = जैसे (योषितम्) = [यु मिश्रण-अमिश्रण] शुभ से जोड़ने व अशुभ से पृथक् करनेवाले प्रभु से प्रेम करता है। जैसे स्तोता का प्रभु से प्रेम है वैसे ही इस 'राहूगण आङ्गिरस' = स्वार्थ से ऊपर उठे, शक्तिशाली पुरुष का मानव प्रजा से प्रेम होता है । यह उनका हित करने में एक आनन्द का अनुभव करता है ।
भावार्थ -
एक प्रभुभक्त मानवहित में रत रहता है । ('सर्वभूतहिते रतः') ही तो प्रभु का सच्चा भक्त है।
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