Loading...

सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1281
ऋषिः - प्रियमेध आङ्गिरसः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
3

ए꣣ष꣢ प꣣वि꣡त्रे꣢ अक्षर꣣त्सो꣡मो꣢ दे꣣वे꣡भ्यः꣢ सु꣣तः꣢ । वि꣢श्वा꣣ धा꣡मा꣢न्यावि꣣श꣢न् ॥१२८१॥

स्वर सहित पद पाठ

ए꣣षः꣢ । प꣣वि꣡त्रे꣢ । अ꣣क्षरत् । सो꣡मः꣢꣯ । दे꣣वे꣡भ्यः꣢ । सु꣣तः꣢ । वि꣡श्वा꣢꣯ । धा꣡मा꣢꣯नि । आ꣣वि꣢शन् । आ꣣ । विश꣢न् ॥१२८१॥


स्वर रहित मन्त्र

एष पवित्रे अक्षरत्सोमो देवेभ्यः सुतः । विश्वा धामान्याविशन् ॥१२८१॥


स्वर रहित पद पाठ

एषः । पवित्रे । अक्षरत् । सोमः । देवेभ्यः । सुतः । विश्वा । धामानि । आविशन् । आ । विशन् ॥१२८१॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1281
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 5; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 10; खण्ड » 4; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
Acknowledgment

पदार्थ -

(एषः) = यह प्रियमेध पवित्रे उस पवित्र प्रभु में १. (अक्षरत्) = [क्षर to drop] सब पापों को क्षरित कर देता है। उस सहस्रधार प्रभु में स्नान करता हुआ यह अपने सब मलों को धो डालता है। २. (सोम:) = निर्मल होकर यह शान्त, सौम्य स्वभाववाला होता है | ३. (देवेभ्यः) - दिव्य गुणों की प्राप्ति के लिए (सुतः) = [सुतमस्यास्ति] सदा यज्ञादि के निर्माणात्मक कर्मों में लगा रहता है । वस्तुत: दिव्यता की प्राप्ति का एक ही साधन है कि हम सदा निर्माण के कार्यों में लगे रहें । इससे हमपर आसुर वृत्तियों का आक्रमण कभी नहीं होता। ४. जीवन के कार्यक्रम को इस प्रकार चलाता हुआ यह (विश्वा धामानि) = सब तेजों को (आविशन्) = प्राप्त करता है । दिन-ब-दिन इसका तेज वृद्धि को प्राप्त होता जाता है।

भावार्थ -

प्रभु के ध्यान से हम अपने जीवनों को निर्मल करनेवाले बनें और नैर्मल्य को प्राप्त कर तेजस्वी हों ।

इस भाष्य को एडिट करें
Top