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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1288
ऋषिः - नृमेध आङ्गिरसः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
4
ए꣣ष꣢꣫ नृभि꣣र्वि꣡ नी꣢यते दि꣣वो꣢ मू꣣र्धा꣡ वृषा꣢꣯ सु꣣तः꣢ । सो꣢मो꣣ व꣡ने꣢षु विश्व꣣वि꣢त् ॥१२८८॥
स्वर सहित पद पाठए꣣षः꣢ । नृ꣡भिः꣢꣯ । वि । नी꣣यते । दिवः꣢ । मू꣣र्धा꣢ । वृ꣡षा꣢꣯ । सु꣣तः꣢ । सो꣡मः꣢꣯ । व꣡ने꣢꣯षु । वि꣡श्ववि꣢त् । वि꣣श्व । वि꣢त् ॥१२८८॥
स्वर रहित मन्त्र
एष नृभिर्वि नीयते दिवो मूर्धा वृषा सुतः । सोमो वनेषु विश्ववित् ॥१२८८॥
स्वर रहित पद पाठ
एषः । नृभिः । वि । नीयते । दिवः । मूर्धा । वृषा । सुतः । सोमः । वनेषु । विश्ववित् । विश्व । वित् ॥१२८८॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1288
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 6; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 10; खण्ड » 5; सूक्त » 1; मन्त्र » 3
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 6; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 10; खण्ड » 5; सूक्त » 1; मन्त्र » 3
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विषय - सदा कर्मों में व्यापृत
पदार्थ -
१. (एषः) = यह ‘नृमेध' स्वयं निष्काम व आप्तकाम होता हुआ भी (नृभिः) = लोगों के दृष्टिकोण से, लोगों के हित के लिए (विनीयते) = उस उस कर्म में प्राप्त कराया जाता है, अर्थात् यह नृमेध मनुष्यों के हित के लिए, लोकसंग्रह के लिए सदा कर्मों में व्याप्त रहता है । २. यह (दिव: मूर्धा) = ज्ञान का शिखर बनता है— अर्थात् ज्ञान की दृष्टि से ऊँची-से-ऊँची स्थिति में पहुँचने का प्रयत्न करता है। ३. (वृषा) = [वृष् to have supreme power] बड़ा शक्तिशाली बनता है । ४. (सुतः) = [सुतमस्यास्ति] - यज्ञमय जीवनवाला होता है – सदा निर्माणात्मक कार्यों को करता है । ५. (सोमः) = सोम का पान करने के कारण सोम बनता है, शक्ति की रक्षा करता हुआ यह अत्यन्त विनीत व शान्त होता है । जब मनुष्य सोम की रक्षा नहीं करता तभी उसके जीवन में निर्बलता व चिड़चिड़ापन होता है । ६. [वननं वन:] (वनेषु) = वासनाओं को जीतने पर यह (विश्ववित्) = सब इष्टों को प्राप्त करनेवाला होता है।" । 'वासना-विजय' ही 'विश्वविजय' का साधन है ।
भावार्थ -
जिस भी व्यक्ति ने लोकहित के कार्यों में प्रवृत्त होना है उसे ऊँचे-से-ऊँचा ज्ञानी, शक्तिशाली, पवित्र जीवनवाला, सौम्य व वासनाओं का विजेता बनना चाहिए । आत्मविजय के बिना लोकहित सम्भव नहीं ।
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