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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1296
ऋषिः - राहूगण आङ्गिरसः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
3
स꣡ वृ꣢त्र꣣हा꣡ वृषा꣢꣯ सु꣣तो꣡ व꣢रिवो꣣वि꣡ददा꣢꣯भ्यः । सो꣢मो꣣ वा꣡ज꣢मिवासरत् ॥१२९६॥
स्वर सहित पद पाठसः । वृ꣡त्र꣢हा । वृ꣣त्र । हा꣢ । वृ꣡षा꣢꣯ । सु꣣तः꣢ । व꣣रिवोवि꣢त् । व꣣रिवः । वि꣢त् । अ꣡दा꣢꣯भ्यः । अ । दा꣣भ्यः । सो꣡मः꣢꣯ । वा꣡ज꣢꣯म् । इ꣣व । असरत् ॥१२९६॥
स्वर रहित मन्त्र
स वृत्रहा वृषा सुतो वरिवोविददाभ्यः । सोमो वाजमिवासरत् ॥१२९६॥
स्वर रहित पद पाठ
सः । वृत्रहा । वृत्र । हा । वृषा । सुतः । वरिवोवित् । वरिवः । वित् । अदाभ्यः । अ । दाभ्यः । सोमः । वाजम् । इव । असरत् ॥१२९६॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1296
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 7; मन्त्र » 5
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 10; खण्ड » 6; सूक्त » 1; मन्त्र » 5
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 7; मन्त्र » 5
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 10; खण्ड » 6; सूक्त » 1; मन्त्र » 5
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विषय - शक्ति के अनुपात में
पदार्थ -
(सः) = वह राहूगण १. (वृत्रहा) = ज्ञान की आवरणभूत वासनाओं का विनाश करनेवाला बनता है। २. (वृषा) = वासनाओं के विनाश के कारण ही शक्तिशाली होता है। वासनाएँ ही तो शक्ति को जीर्ण करती हैं। वासनाओं के विनाश से शक्ति सुरक्षित रहती है। ३. इस सुरक्षित शक्ति से यह (सुतः) = निर्माण के कार्य में लगा रहता है 'सुतमस्यास्तीति' यज्ञादि के अन्दर सदा प्रवृत्त होता है । ४. इन निर्माण के कार्यों में तथा यज्ञों में लगा रहकर यह (वरिवोवित्) = धन प्राप्त करता है । निर्माण के कार्य धनैश्वर्य के उत्पादक तो होते ही हैं । ५. धन को प्राप्त हुआ हुआ वह व्यक्ति (अदाभ्यः) = न दबनेवाला व अहिंसित होता है । ६. 'दबता नहीं' का यह अभिप्राय नहीं कि यह अक्खड़ होता है। अक्खड़ होना तो दूर रहा, वह (सोमः) = अत्यन्त सौम्य व शान्त है । ७. यह सौम्य व्यक्ति (वाजम् इव) = अपनी शक्ति के अनुसार (असरत्) = उस प्रभु की ओर बढ़ता है। जितनी शक्ति होती है उसी के अनुपात में प्रभु की भी प्राप्ति होती है। (‘नायमात्माबलहीनेन लभ्यः'), निर्बल को प्रभु थोड़े ही मिलते हैं ?
भावार्थ -
जीव वृत्रहा बनकर वृत्र के विनाशक प्रभु को प्राप्त होता है।