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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 13
ऋषिः - प्रयोगो भार्गवः
देवता - अग्निः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम - आग्नेयं काण्डम्
6
उ꣡प꣢ त्वा जा꣣म꣢यो꣣ गि꣢रो꣣ दे꣡दि꣢शतीर्हवि꣣ष्कृ꣡तः꣢ । वा꣣यो꣡रनी꣢꣯के अस्थिरन् ॥१३॥
स्वर सहित पद पाठउ꣡प꣢꣯ । त्वा꣣ । जाम꣡यः꣢ । गि꣡रः꣢꣯ । दे꣡दि꣢꣯शतीः । ह꣣विष्कृ꣡तः꣢ । ह꣣विः । कृ꣡तः꣢꣯ । वा꣣योः꣢ । अ꣡नी꣢꣯के । अ꣣स्थिरन् ॥१३॥
स्वर रहित मन्त्र
उप त्वा जामयो गिरो देदिशतीर्हविष्कृतः । वायोरनीके अस्थिरन् ॥१३॥
स्वर रहित पद पाठ
उप । त्वा । जामयः । गिरः । देदिशतीः । हविष्कृतः । हविः । कृतः । वायोः । अनीके । अस्थिरन् ॥१३॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 13
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 2; मन्त्र » 3
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 2;
Acknowledgment
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 2; मन्त्र » 3
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 2;
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विषय - वायु के समान बल की प्राप्ति
पदार्थ -
(हविष्कृत:)= [त्वयि एव हूयते निधीयते न तु विषयेषु इति हवि:- शुद्धमन:, दानपूर्वकमदनशीलं मनः=हु दानादनयोः तत्करोति, तस्य] दानपूर्वक अदन-भक्षण को अपना स्वभाव बना लेनेवाले पुरुष की (त्वा उप)=तेरे समीप (जामयः)= गति करनेवाली अर्थात् तेरी समीपता से कभी इधर-उधर न भटकनेवाली, (देदिशती:)= निरन्तर तेरा निर्देश करती हुई (गिरः)= वाणियाँ भक्त को (वायोः अनीके)= वायु के बल में वायु के समान शक्ति में (अस्थिरन्)= स्थित करती हैं।
जब एक मनुष्य अपने जीवन को भोगप्रधान न बनाकर अपनी शक्तियों को जीर्ण न होने देगा तो उसे वायु के समान अत्यधिक शक्ति क्यों न प्राप्त होगी? परन्तु जीवन को भोगप्रधान न बनने देने का साधन क्या है? यह साधन ही इस मन्त्र में ("उप त्वा जामयो गिर:") इन शब्दों में वर्णित हुआ है 'निरन्तर तेरे समीप प्राप्त होनेवाली वाणियाँ।' जागते-सोते, खाते-पीते, उठते-बैठते सदा हमारी वाणी उस प्रभु का स्मरण करे, तभी ऐसा सम्भव है। 'देदिशती: ' हमारी वाणियाँ उस प्रभु का ही निर्देश करती हों। शरीर से कार्य चल रहे हों, परन्तु मन व वाणी प्रभु का ध्यान व जप कर रहे हों ।
यदि इस प्रकार सब क्रियाओं को करते हुए भी हमारा सम्पर्क उस प्रभु से बना रहेगा, तो इस प्रकृष्ट योग= सम्बन्ध के कारण हम इस मन्त्र के ऋषि 'प्रयोग' बनेंगे।
भावार्थ -
‘हमारा प्रत्येक कार्य प्रभु-स्मरणपूर्वक चल रहा हो ।' यही मार्ग है भोगों के शिकार न होने का और शक्ति के लाभ का।
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