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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1490
ऋषिः - प्रियमेध आङ्गिरसः देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
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आ꣡ ह꣢꣯रयः ससृज्रि꣣रे꣡ऽरु꣢षी꣣र꣡धि꣢ ब꣣र्हि꣡षि꣢ । य꣢त्रा꣣भि꣢ सं꣣न꣡वा꣢महे ॥१४९०॥

स्वर सहित पद पाठ

आ꣢ । ह꣡र꣢꣯यः । स꣣सृज्रिरे । अ꣡रु꣢꣯षीः । अ꣡धि꣢꣯ । ब꣣र्हि꣡षि꣢ । य꣡त्र꣢꣯ । अ꣣भि꣢ । सं꣣न꣡वा꣢महे । स꣣म् । न꣡वा꣢꣯महे ॥१४९०॥


स्वर रहित मन्त्र

आ हरयः ससृज्रिरेऽरुषीरधि बर्हिषि । यत्राभि संनवामहे ॥१४९०॥


स्वर रहित पद पाठ

आ । हरयः । ससृज्रिरे । अरुषीः । अधि । बर्हिषि । यत्र । अभि । संनवामहे । सम् । नवामहे ॥१४९०॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1490
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 7; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 14; खण्ड » 1; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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पदार्थ -

इन्द्रियाँ इस शरीररूप रथ के घोड़े हैं। ये सदा घोड़ों की भाँति इधर-उधर घूमती रहती हैं, इसी से ये (अरुषी:) = [moving about like a horse] इधर-उधर घूमनेवाली कहलाती हैं | तत्त्वज्ञान की प्राप्ति में लगने पर ये चमक उठती हैं, इसलिए भी ये 'अरुषी: ' चमकती [ bright, shining] हुई कहलाती हैं। इस स्थिति में ये आसुर आक्रमणों से विद्ध नहीं होती, अ-विद्ध-अनाहत [unhurt ] होने से भी ये ‘अरुषी' हैं। ये (अरुषीः) = सामान्यतः इधर-उधर घूमनेवाली, ज्ञान को प्राप्त करने में लगने पर चमकनेवाली और आसुर आक्रमणों से अबिद्ध (हरयः) = इन्द्रियाँ (आ) = चारों ओर से (अधिबर्हिषि) = उस हृदयान्तरिक्ष में, जिसमें से कि सब वासनाओं का उद्बर्हण कर दिया गया है, (ससृज्रिरे) = [सृज्=put on, place on, apply] रखी गयी हैं। इनका भटकना समाप्त हो गया है और इनका मन में निरोध कर दिया गया है ।

उस मन में हम इन इन्द्रियों का निरोध करें (यत्र) = जहाँ (अभि-सं-नवामहे) = चारों ओर से [अभि] सब चित्तवृत्तियों को केन्द्रित [सम्] करके हम प्रभु का स्तवन [नू-स्तुतौ] करें । इन्द्रियों का मन में निरोध ही एक देश में बन्धरूप 'धारणा' है और चित्तवृत्तियों को एकाग्र कर प्रभु की महिमा का चिन्तन ही ‘ध्यान’ है । यही ध्यान हमें समाधि की ओर अग्रसर करेगा और हम प्रभु का साक्षात्कार करनेवाले बनेंगे।

भावार्थ -

हम इन्द्रियों का मन में निरोध करें – मन को प्रभु चिन्तन में प्रवृत्त करें । 

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