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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1534
ऋषिः - विरूप आङ्गिरसः
देवता - अग्निः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
4
उ꣡द꣢ग्ने꣣ शु꣡च꣢य꣣स्त꣡व꣢ शु꣣क्रा꣡ भ्राज꣢꣯न्त ईरते । त꣢व꣣ ज्यो꣡ती꣢ꣳष्य꣣र्च꣡यः꣢ ॥१५३४॥
स्वर सहित पद पाठउत् । अ꣣ग्ने । शु꣡च꣢꣯यः । त꣡व꣢꣯ । शु꣣क्राः꣢ । भ्रा꣡ज꣢꣯न्तः । ई꣣रते । त꣡व꣢꣯ । ज्यो꣡ती꣢꣯ꣳषि । अ꣣र्च꣡यः꣢ ॥१५३४॥
स्वर रहित मन्त्र
उदग्ने शुचयस्तव शुक्रा भ्राजन्त ईरते । तव ज्योतीꣳष्यर्चयः ॥१५३४॥
स्वर रहित पद पाठ
उत् । अग्ने । शुचयः । तव । शुक्राः । भ्राजन्तः । ईरते । तव । ज्योतीꣳषि । अर्चयः ॥१५३४॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1534
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 7; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 16; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 14; खण्ड » 4; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 7; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 16; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 14; खण्ड » 4; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
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विषय - उन्नति के तीन तत्त्व
पदार्थ -
अपने स्तोता ‘विरूप' से प्रभु कहते हैं कि – हे (अग्ने) = उन्नतिशील, उन्नति-पथ पर निरन्तर आगे बढ़नेवाले विरूप १. (तव) = तेरे (शुचयः) = पवित्र व उज्वल (भ्राजन्तः) = चमकते हुए - तेरे जीवन को दीप्त बनाते हुए (शुक्रा:) = वीर्यकण-शक्ति के बिन्दु (उद् ईरते) = सदा ऊर्ध्वगतिवाले होते हैं और शरीर के अङ्ग-प्रत्यङ्ग में व्याप्त होकर रोग-कृमियों को कम्पित कर तेरे शरीर को नीरोग बनाते हैं। रोगकृमियों को उत्=बाहर [out] निकाल भगाते हैं, तभी तू विरूप बना है – तेरा चेहरा स्वास्थ्य की दीप्ति से चमक रहा है ।
२. ये ही वीर्यकण मस्तिष्क में पहुँचकर ज्ञानाग्नि को समिद्ध करते हैं और (तव ज्योतींषि) = तेरी ज्ञान की ज्योतियाँ (भ्राजन्त:) = चमकती हुई होती हैं ।
३. (तव) = तेरी (अर्चयः) = उपासना की [अर्च पूजायाम्] वृत्तियाँ भी (उदीरते) = उन्नत होती हैं । तुझमें अधिकाधिक प्रभु-स्तवन की प्रवृत्ति होती है ।
एवं, इस मन्त्र में प्रभु ने उन्नति के तीन आवश्यक अङ्गों का संकेत किया है । १. प्रथम तो पवित्र व उज्ज्वल सोम=वीर्यकणों की ऊर्ध्वगति । यह इन्द्र का सोमपान है— इसके बिना 'इन्द्र' इन्द्र नहीं बन सकता। २. ज्ञान की ज्योति का दीप्त होना तथा ३. उपासना की वृत्ति का प्रबल होना।
भावार्थ -
हम उन्नति के तत्त्वों को समझकर उन्नति के मार्ग को अपनाएँ। हम सोमपान करें, अर्थात् संयमी जीवनवाले बनें, ज्ञान की ज्योति को जगाएँ, अर्चनामय जीवन बनाएँ ।
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