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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1599
ऋषिः - शुनःशेप आजीगर्तिः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
2
अ꣣य꣡मु꣢ ते꣣ स꣡म꣢तसि क꣣पो꣡त꣢ इव गर्भ꣣धि꣢म् । व꣢च꣣स्त꣡च्चि꣢न्न ओहसे ॥१५९९॥
स्वर सहित पद पाठअ꣣य꣢म् । उ꣣ । ते । स꣡म् । अ꣣तसि । कपो꣡तः꣢ । इ꣣व । गर्भधि꣢म् । ग꣣र्भ । धि꣢म् । व꣡चः꣢꣯ । तत् । चि꣣त् । नः । ओहसे ॥१५९९॥
स्वर रहित मन्त्र
अयमु ते समतसि कपोत इव गर्भधिम् । वचस्तच्चिन्न ओहसे ॥१५९९॥
स्वर रहित पद पाठ
अयम् । उ । ते । सम् । अतसि । कपोतः । इव । गर्भधिम् । गर्भ । धिम् । वचः । तत् । चित् । नः । ओहसे ॥१५९९॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1599
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 7; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 15; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 16; खण्ड » 3; सूक्त » 5; मन्त्र » 1
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 7; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 15; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 16; खण्ड » 3; सूक्त » 5; मन्त्र » 1
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विषय - ज्ञान-नौका से भवसागर को तैरना
पदार्थ -
१८३ संख्या पर इस मन्त्र का अर्थ इस प्रकार है (अयम् उ ते) = मैं निश्चय से अब आपका हूँ। आप भी मुझे (सम् अतसि) = अच्छी प्रकार होते हो । अब मैं (गर्भधिम्) = इस जन्म-मरण के आवर्तीवाले समुद्र को (इव) = उस व्यक्ति की भाँति कर लेता हूँ जिसने कि (कपोतः) = मस्तिष्क व ज्ञान को ही अपनी नाव बनाया है । हे प्रभो ! (नः) = हमें (तत् वच: चित्) = वेदज्ञान के वचन भी तो (ओहसे) = आप ही प्राप्त कराते हो ।
भावार्थ -
ज्ञान-नौका से भवसागर को तैर कर हम सच्चे सुख का निर्माण करनेवाले 'शेप' बनें ।
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