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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1668
ऋषिः - शंयुर्बार्हस्पत्यः देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
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कु꣣वि꣡त्स꣢स्य꣣ प्र꣢꣫ हि व्र꣣जं꣡ गोम꣢꣯न्तं दस्यु꣣हा꣡ गम꣢꣯त् । श꣡ची꣢भि꣣र꣡प꣢ नो वरत् ॥१६६८॥

स्वर सहित पद पाठ

कु꣣वि꣢त्सस्य । कु꣣वि꣢त् । स꣣स्य । प्र꣢ । हि । व्र꣡ज꣢म् । गो꣡म꣢꣯न्तम् । द꣣स्युहा꣢ । द꣣स्यु । हा꣢ । ग꣡म꣢꣯त् । श꣡ची꣢꣯भिः । अ꣡प꣢꣯ । नः꣣ । वरत् ॥१६६८॥


स्वर रहित मन्त्र

कुवित्सस्य प्र हि व्रजं गोमन्तं दस्युहा गमत् । शचीभिरप नो वरत् ॥१६६८॥


स्वर रहित पद पाठ

कुवित्सस्य । कुवित् । सस्य । प्र । हि । व्रजम् । गोमन्तम् । दस्युहा । दस्यु । हा । गमत् । शचीभिः । अप । नः । वरत् ॥१६६८॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1668
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 4; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 18; खण्ड » 1; सूक्त » 4; मन्त्र » 3
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पदार्थ -

जीव 'कुवित्स' है [कु - वित्] – इसका ज्ञान अल्प है, अतएव अप्रशस्त है – इस अल्पज्ञता के कारण ही जीव अनेक ग़लतियाँ भी कर बैठता है । इन ग़लतियों के परिणामरूप ही उसकी स्वतन्त्रता नष्ट हो जाती है और इसे इस शरीररूप बाड़े में क़ैद होना पड़ता है । यह शरीररूप बाड़ा भी गौवोंवाला है—इन्द्रियाँ ही यहाँ गौवें हैं। ‘गाव:' शब्द के दोनों ही अर्थ हैं—गौवें तथा इन्द्रियाँ । वे प्रभु ‘दस्युहा' हैं—शरीररूप बाड़े में इन्द्रियरूप गौवों की चोरी के लिए कामादि दस्यु प्रवेश करते हैं—परन्तु वहाँ उपस्थित प्रभु उन दस्युओं का नाश कर देते हैं। वास्तव में तो जब प्रभू इस बाड़े में आते हैं तब इस बाड़े की आवश्यकता ही नहीं रहती । जीव मोक्ष प्राप्त कर लेता है । मोक्ष के लिए आवश्यक ज्ञान व कर्म प्रभु की कृपा से प्राप्त होता है और हम इस बाड़े को अपने से दूर कर पाते हैं। यदि काव्य के शब्दों में कहें तो कामादि दस्यु तो इन्द्रियरूप गौवों को ही चुरा रहे थे; दस्युहा प्रभु आते हैं और बाड़े का भी सफ़ाया कर देते हैं । मन्त्र में कहा है कि

(कुवित्सस्य) = अल्पज्ञ जीव के (गोमन्तं व्रजम्) = इस इन्द्रियरूप गौवोंवाले शरीररूप बाड़े को जब (हि) = निश्चय से (दस्युहा) = कामादि दस्युओं का नाश करनेवाले प्रभु (आगमत्) = प्रकर्षेण प्राप्त होते हैं [सर्वव्यापकता के नाते तो वे यहाँ हैं ही, हमें जब उनका ज्ञान होता है तब यही उनका प्रकर्षेण प्राप्त होना कहलाता है] तब (शचीभिः) = प्रज्ञानों व शक्तिशाली कर्मों से [शची=१. प्रज्ञा २. कर्म] (न:) = हमसे (अपवरत्) = इस बाड़े को दूर कर देते हैं । वस्तुत: बाड़े में छिपकर रहने की अब आवश्यकता ही क्या है ? उस सर्वशक्तिमान् प्रभु के सान्निध्य में कोई भय है क्या जो छिपकर रहा जाए? अब मन में किसी प्रकार का भय नहीं रह जाता । यह व्यक्ति सचमुच 'शंयु' बन जाता है । 

भावार्थ -

मैं अपने इस बाड़े में प्रभु को आमन्त्रित करूँ ।

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