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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1700
ऋषिः - निध्रुविः काश्यपः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
3
प꣡व꣢माना दि꣣व꣢꣫स्पर्य꣣न्त꣡रि꣢क्षादसृक्षत । पृ꣣थिव्या꣢꣫ अधि꣣ सा꣡न꣢वि ॥१७००॥
स्वर सहित पद पाठप꣡व꣢꣯मानाः । दि꣣वः꣢ । प꣡रि꣢꣯ । अ꣣न्त꣡रि꣢क्षात् । अ꣣सृक्षत । पृथिव्याः꣣ । अ꣡धि꣢꣯ । सा꣡न꣢꣯वि ॥१७००॥
स्वर रहित मन्त्र
पवमाना दिवस्पर्यन्तरिक्षादसृक्षत । पृथिव्या अधि सानवि ॥१७००॥
स्वर रहित पद पाठ
पवमानाः । दिवः । परि । अन्तरिक्षात् । असृक्षत । पृथिव्याः । अधि । सानवि ॥१७००॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1700
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 16; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 18; खण्ड » 4; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 16; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 18; खण्ड » 4; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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विषय - शिखर पर, त्रिलोकी का सजाना
पदार्थ -
(पवमाना:) = पवित्र करनेवाले सोम (दिव:) = द्युलोक के हेतु से (अन्तरिक्षात्) = अन्तरिक्ष के हेतु से और (पृथिव्याः) = पृथिवी के हेतु से (परि असृक्षत) = इस शरीर में चारों और निर्मित हुए हैं । जब यह सोम शरीर में सारे रुधिर में व्याप्त हो जाता है, तब वह धुलोक, अन्तरिक्ष व पृथिवी को सुन्दर बनानेवाला होता है, द्युलोक, अर्थात् मस्तिष्क को उज्ज्वल बनाता है, अन्तरिक्ष, अर्थात् हृदय को निर्मल बनाता है और पृथिवी, अर्थात् शरीर को दृढ़ बनाता है।
क्या शरीर, क्या मन और क्या मस्तिष्क सभी दृष्टिकोणों से यह उसे (अधि सानवि) = शिखर पर पहुँचानेवाला होता है । यह सोम द्युलोक को उग्र तेजस्वी बनाता है, अर्थात् मस्तिष्क को दीप्त करता है, पृथिवी, अर्थात् शरीर को दृढ़ बनाता है और अन्तरिक्षरूपी हृदय में उचित राग का निर्माण करता है।
भावार्थ -
सोम हमारी त्रिलोकी को सुभूषित करता है ।
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