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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1727
ऋषिः - वामदेवो गौतमः देवता - उषाः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
1

उ꣣त꣡ सखा꣢꣯स्य꣣श्वि꣡नो꣢रु꣣त꣢ मा꣣ता꣡ गवा꣢꣯मसि । उ꣣तो꣢षो꣣ व꣡स्व꣢ ईशिषे ॥१७२७॥

स्वर सहित पद पाठ

उ꣣त꣢ । स꣡खा꣢꣯ । स । खा꣣ । असि । अश्वि꣡नोः꣢꣯ । उ꣣त꣢ । मा꣣ता꣢ । ग꣡वा꣢꣯म् । अ꣣सि । उ꣣त꣢ । उ꣣षः । व꣡स्वः꣢꣯ । ई꣣शिषे ॥१७२७॥


स्वर रहित मन्त्र

उत सखास्यश्विनोरुत माता गवामसि । उतोषो वस्व ईशिषे ॥१७२७॥


स्वर रहित पद पाठ

उत । सखा । स । खा । असि । अश्विनोः । उत । माता । गवाम् । असि । उत । उषः । वस्वः । ईशिषे ॥१७२७॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1727
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 6; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 19; खण्ड » 2; सूक्त » 1; मन्त्र » 3
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पदार्थ -

१. हे (उषः) = उष:काल ! तू (उत) = एक तो (अश्विनोः सखा असि) = प्राणापान का सखा है । तुझमें योगीलोग प्राणापान की साधना किया करते हैं। प्रातःकाल शुद्ध वायु में भ्रमण भी स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त उपयोगी है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उसमें ozone का अंश अधिक होता है, अतएव वह हमारे श्वासोच्छ्वास के लिए भी अधिक उपयोगी होती है । इस प्रकार उषा प्राणापान की मित्र है। 

२. (उत) = और हे उष: !-तू (गवाम् माता असि) = हमारी इन्द्रियों की निर्मात्री है। तू उषर्बुद्धों को कर्मेन्द्रियों द्वारा यज्ञ में प्रवृत्त होने के लिए प्रेरणा देती है तथा ज्ञानेन्द्रियों द्वारा पाँचों प्रकार से ज्ञान प्राप्ति में जुट जाने के लिए कहती है । इस प्रकार कर्मेन्द्रियाँ भी सशक्त बनती हैं और ज्ञानेन्द्रियाँ भी उज्ज्वल । 

३. हे उषः ! तू (वस्वः उत) = निवास के लिए आवश्यक धन का भी (ईशिषे) = ईशन करती है, अर्थात् जो मनुष्य प्रातः काल उठकर अपने नित्यकृत्यों को ठीक से करता है वह शक्ति-सम्पन्न व समझदार बनकर जीवन-यात्रा के लिए आवश्यक धन को भी ठीक से जुटा पाता है। ।

यह संसार एक संघर्ष का स्थान है। इस संघर्ष में विजयी बनने के लिए प्रात: जागरण आवश्यक है, इसीलिए इस संग्राम के करनेवाले, इन मन्त्रों के ऋषि पुरुमीढ और अजमीढ उषा से प्रेरणा प्राप्त करते हैं। उस प्रेरणा का परिणाम शक्ति व ज्ञानवृद्धि तथा जीवन-यात्रा के लिए आवश्यक धन की प्राप्ति के रूप में होता है ।

भावार्थ -

मैं उष:काल से प्रेरणा प्राप्त कर शक्ति, ज्ञान व धन का विजेता बनूँ ।

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