Sidebar
सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1793
ऋषिः - वसिष्ठो मैत्रावरुणिः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - विराडनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
काण्ड नाम -
3
प्र꣡ वो꣢ म꣣हे꣡ म꣢हे꣣वृ꣡धे꣢ भरध्वं꣣ प्र꣡चे꣢तसे꣣ प्र꣡ सु꣢म꣣तिं꣡ कृ꣢णुध्वम् । वि꣡शः꣢ पू꣣र्वीः꣡ प्र च꣢꣯र चर्षणि꣣प्राः꣢ ॥१७९३॥
स्वर सहित पद पाठप्र꣢ । वः꣣ । महे꣢ । म꣣हेवृ꣡धे꣢ । म꣣हे । वृ꣡धे꣢꣯ । भ꣣रध्वम् । प्र꣡चे꣢꣯तसे । प्र । चे꣣तसे । प्र꣢ । सु꣣मति꣢म् । सु꣣ । मति꣢म् । कृ꣣णुध्वम् । वि꣡शः꣢꣯ । पू꣣र्वीः꣢ । प्र । च꣣र । चर्षणिप्राः꣣ । च꣣र्षणि । प्राः꣢ ॥१७९३॥
स्वर रहित मन्त्र
प्र वो महे महेवृधे भरध्वं प्रचेतसे प्र सुमतिं कृणुध्वम् । विशः पूर्वीः प्र चर चर्षणिप्राः ॥१७९३॥
स्वर रहित पद पाठ
प्र । वः । महे । महेवृधे । महे । वृधे । भरध्वम् । प्रचेतसे । प्र । चेतसे । प्र । सुमतिम् । सु । मतिम् । कृणुध्वम् । विशः । पूर्वीः । प्र । चर । चर्षणिप्राः । चर्षणि । प्राः ॥१७९३॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1793
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 11; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 20; खण्ड » 3; सूक्त » 2; मन्त्र » 1
Acknowledgment
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 11; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 20; खण्ड » 3; सूक्त » 2; मन्त्र » 1
Acknowledgment
विषय - तीन बातें
पदार्थ -
प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि ‘मैत्रावरुणि वसिष्ठ' है— प्राणापान की साधना करनेवाला, इन्द्रियों को पूर्णरूप से वश में करनेवाला । यह अपने मित्रों से तीन बातें कहता है१. (व:) = तुम्हारी (महे वृधे) = महान् उन्नति के लिए अपने को (महे) = उस महान् प्रभु के प्रति (प्रभरध्वम्) = प्रकर्षेण ले-चलो [हृ=भृ]। प्रात:सायं नमन के द्वारा उस प्रभु के प्रति जाने से तुम्हारा जीवन अधिक और अधिक उन्नत होता चलेगा । वस्तुत: जिसके समीप उठते-बैठते हैं वैसे ही हम बन जाते हैंदोनों समय उस प्रभु के समीप उठें-बैठेंगे तो कुछ उस जैसे ही बन जाएँगे ।
२. (प्रचेतसे) = अपने प्रकृष्ट ज्ञान के लिए - चेतना को ठीक बनाये रखने के लिए - सदा (प्रसुमतिम्) = अत्यन्त प्रकृष्ट कल्याणी मति को (कृणुध्वम्) = कीजिए। हममें कभी भी अशुभ मति उत्पन्न न हो । यदि एक बार हम बदले की भावना से चल पड़े तो हमारी सब चेतना लुप्त हो जाएगी । हमें अपने जीवन का उद्देश्य भूल जाएगा और हम कहीं-के-कहीं पहुँच जाएँगे।
३. (चर्षणि-प्राः) = मनुष्यों का पूरण करनेवाला तू (पूर्वी:) = अपना पूरण करनेवाली (विशः) = प्रजाओं में (प्रचर) = उत्तम विचारों का प्रचार कर । तुझमें सबको उत्तम बनाने की भावना हो, तू लोगों में उन्नति की इच्छा उत्पन्न कर और उनमें उन्नति के साधक विचारों को फैलानेवाला बन ।
भावार्थ -
अपनी महान् उन्नति के लिए हम महान् प्रभु के चरणों में उपस्थित हों। अपने जीवन के लक्ष्य को विस्मृत न होने देने के लिए सदा कल्याणी मति बनाए रक्खें। मनुष्यों का पूरण करनेवाला बनकर, उन्नति की इच्छुक प्रजाओं में उत्तम विचारों का प्रचार करें।