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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1822
ऋषिः - सौभरि: काण्व: देवता - अग्निः छन्दः - काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती) स्वरः - ऋषभः काण्ड नाम -
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प्र꣡ सो अ꣢꣯ग्ने꣣ त꣢वो꣣ति꣡भिः꣢ सु꣣वी꣡रा꣢भिस्तरति꣣ वा꣡ज꣢कर्मभिः । य꣢स्य꣣ त्व꣢ꣳ स꣣ख्य꣡मावि꣢꣯थ ॥१८२२॥

स्वर सहित पद पाठ

प्रः꣢ । सः । अ꣣ग्ने । त꣡व꣢꣯ । ऊ꣣ति꣡भिः꣢ । सु꣣वी꣡रा꣢भिः । सु꣣ । वी꣡रा꣢꣯भिः । त꣣रति । वा꣡ज꣢꣯कर्मभिः । वा꣡ज꣢꣯ । क꣣र्मभिः । य꣡स्य꣢꣯ । त्वम् । स꣣ख्य꣢म् । स꣣ । ख्य꣢म् । आ꣡वि꣢꣯थ ॥१८२२॥


स्वर रहित मन्त्र

प्र सो अग्ने तवोतिभिः सुवीराभिस्तरति वाजकर्मभिः । यस्य त्वꣳ सख्यमाविथ ॥१८२२॥


स्वर रहित पद पाठ

प्रः । सः । अग्ने । तव । ऊतिभिः । सुवीराभिः । सु । वीराभिः । तरति । वाजकर्मभिः । वाज । कर्मभिः । यस्य । त्वम् । सख्यम् । स । ख्यम् । आविथ ॥१८२२॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1822
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 2; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 20; खण्ड » 6; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
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पदार्थ -

हे (अग्ने) = सब प्रकार से अग्रगति के साधक प्रभो ! (यस्य) = जिसके (त्वम्) = आप (सख्यम्) = मैत्रीभाव को (आविथ) = प्राप्त होते हो (सः) वह व्यक्ति (तव) = आपकी (सुवीराभिः) = उत्तम वीर बनानेवाले तथा (वाजकर्मभिः) = शक्तिशाली कर्मोंवाले (ऊतिभिः) = रक्षणों से (प्रतरति) = भवसागर को तैर जाता है । 

जब जीव प्रभु को सदा अपनी आँखों के सामने रखने का प्रयत्न करते हैं तब वे प्रभु की मित्रता को प्राप्त करते हैं। प्रभु की मित्रता को प्राप्त करनेवाले इन व्यक्तियों को कभी कायरता नहीं छूतीप्रभु के रक्षण में कायरता का क्या काम ? पिता की गोद में स्थित बच्चा कभी घबराता नहीं, तो क्या उस अमर प्रभु से सर्वतोवेष्टित यह प्रभुभक्त कभी घबराएगा? इस प्रभुभक्त के कर्म शक्तिसम्पन्न होते हैं। इसने प्रभुस्तवन के द्वारा प्रभु के अधिक और अधिक निकट होते हुए, कण-कण करके बड़े उत्तम प्रकार से [सु] अपने में शक्ति को भरा है [भर], इसी से इसका नाम 'काण्व सोभरि' पड़ गया है। वस्तुत: प्रभु की मित्रता से जीव अपनी शक्ति को उत्तरोत्तर बढ़ाता चलता है। यह शक्ति ही इसे इस जीवन-यात्रा में सफल करती है ।

भावार्थ -

मैं प्रभु का मित्र बनकर भवसागर को तैर जाऊँ ।

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