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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 1862
ऋषिः - अप्रतिरथ ऐन्द्रः देवता - इन्द्रो मरुतो वा छन्दः - अनुष्टुप् स्वरः - गान्धारः काण्ड नाम -
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प्रे꣢ता꣣ ज꣡य꣢ता नर꣣ इ꣡न्द्रो꣢ वः꣣ श꣡र्म꣢ यच्छतु । उ꣣ग्रा꣡ वः꣢ सन्तु बा꣣ह꣡वो꣢ऽनाधृ꣣ष्या꣡ यथास꣢꣯थ ॥१८६२॥

स्वर सहित पद पाठ

प्र꣢ । इ꣣त । ज꣡य꣢꣯त । न꣣रः । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । वः꣣ । श꣡र्म꣢꣯ । य꣣च्छतु । उग्राः꣢ । वः꣣ । सन्तु । बाह꣡वः꣢ । अ꣣नाधृष्याः꣢ । अ꣣न् । आधृष्याः꣢ । य꣡था꣢꣯ । अ꣡स꣢꣯थ ॥१८६२॥


स्वर रहित मन्त्र

प्रेता जयता नर इन्द्रो वः शर्म यच्छतु । उग्रा वः सन्तु बाहवोऽनाधृष्या यथासथ ॥१८६२॥


स्वर रहित पद पाठ

प्र । इत । जयत । नरः । इन्द्रः । वः । शर्म । यच्छतु । उग्राः । वः । सन्तु । बाहवः । अनाधृष्याः । अन् । आधृष्याः । यथा । असथ ॥१८६२॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 1862
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 5; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 21; खण्ड » 1; सूक्त » 5; मन्त्र » 2
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पदार्थ -

'नर' शब्द की भावना ‘न-रम्'= इस संसार में ही न रम जाने की है। संसार में रहते हुए भी इसमें न फँसना- आवश्यकता से अधिक धन की भावना को अपने में दृढ़मूल न होने देनेवाला मनुष्य ही ‘नर’ है। ये लोग ही संसार में आकर आध्यात्ममार्ग में भी आगे बढ़ा करते हैं । मन्त्र में कहते हैं कि (नरः) = अपने को आगे और आगे ले-चलनेवाले मनुष्यो ! [नृ नये] (प्रेत) = आगे बढ़ो, यह धन तुम्हारे जीवन-यात्रा के मार्ग में रुकावट बनकर न खड़ा हो जाए | (जयत) = इस विघ्न को जीत लो, बस यही तो सबसे बड़ा विघ्न है । इसका मोहक स्वरूप यह है कि “इसके बिना तुम्हारी संसार-यात्रा नहीं चलेगी, नमक भी तो न मिल सकेगा। कोई बन्धु-बान्धव तुम्हें पूछेगा नहीं, समाज में तुम्हारी प्रतिष्ठा न होगी'', परन्तु वास्तविकता इससे भिन्न है। धन सीमितरूप में सहायक है, लोभ को जन्म देकर यह महान् विघ्न बन जाता है । वेद कहता है कि (इन्द्रः) = वह सब ऐश्वर्यों का स्वामी प्रभु (वः) = तुम्हें (शर्म यच्छतु) = शरण दे । धन ने क्या शरण देनी। धनों के स्वामी के चरणों की शरण प्राप्त हो जाने पर इस तुच्छ धन का महत्त्व ही क्या रह जाता है ? 

जब मनुष्य धन का दास नहीं रहता, तब उसे कभी भी टेढ़े-मेढ़े साधनों से नहीं कमाता । वेद का यही आदेश है कि (वः) = तुम्हारे (बाहवः) = प्रयत्न [बाह्र प्रयत्ने] (उग्राः सन्तु) = उत्कृष्ट हों । वस्तुतः धन का दास न रहने पर मनुष्य कभी भी अन्याय्य मार्ग से इसका सञ्चय नहीं करता । वेद कहता है कि प्रभु की शरण पकड़ो - उत्कृष्ट श्रम करो (यथा) = जिससे तुम (अनाधृष्याः) = लोभादि से न कुचले जानेवाले (असथ) = हो जाओ । मनुष्य का यही ध्येय होना चाहिए कि वह कभी अन्याय से अर्थ का संचय करना न चाहे । यही उन्नति का मार्ग है ।

भावार्थ -

हम आगे बढ़ें, लोभ को जीतें, प्रभु की शरण ग्रहण करें, उत्कृष्ट श्रम करते हुए ही धनार्जन करें।

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