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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1863
ऋषिः - पायुर्भारद्वाजः
देवता - इषवः
छन्दः - अनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
काण्ड नाम -
3
अ꣡व꣢सृष्टा꣣ प꣡रा꣢ पत꣣ श꣡र꣢व्ये꣣ ब्र꣡ह्म꣢सꣳशिते । ग꣢च्छा꣣मि꣢त्रा꣣न्प्र꣡ प꣢द्यस्व꣣ मा꣢꣫मीषां꣣ कं꣢ च꣣ नो꣡च्छि꣢षः ॥१८६३॥
स्वर सहित पद पाठअ꣡व꣢꣯ । सृ꣣ष्टा । प꣡रा꣢꣯ । प꣣त । श꣡र꣢꣯व्ये । ब्र꣡ह्म꣢꣯शꣳसिते । ब्र꣡ह्म꣢꣯ । श꣣ꣳसिते । ग꣡च्छ꣢꣯ । अ꣣मि꣡त्रा꣢न् । अ꣣ । मि꣡त्रा꣢꣯न् । प्र । प꣣द्यस्व । मा꣢ । अ꣣मी꣡षा꣢म् । कम् । च꣣ । न꣢ । उत् । शि꣣षः ॥१८६३॥
स्वर रहित मन्त्र
अवसृष्टा परा पत शरव्ये ब्रह्मसꣳशिते । गच्छामित्रान्प्र पद्यस्व मामीषां कं च नोच्छिषः ॥१८६३॥
स्वर रहित पद पाठ
अव । सृष्टा । परा । पत । शरव्ये । ब्रह्मशꣳसिते । ब्रह्म । शꣳसिते । गच्छ । अमित्रान् । अ । मित्रान् । प्र । पद्यस्व । मा । अमीषाम् । कम् । च । न । उत् । शिषः ॥१८६३॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1863
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 5; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 21; खण्ड » 1; सूक्त » 5; मन्त्र » 3
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 5; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 21; खण्ड » 1; सूक्त » 5; मन्त्र » 3
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विषय - लक्ष्यदृष्टि
पदार्थ -
संसार में न फँसने व निरन्तर आगे और आगे बढ़ने के लिए आवश्यक है कि मनुष्य अपने सामने एक ध्येय–लक्ष्य रक्खे । लक्ष्य ओझल हुआ और मनुष्य भटका । यह लक्ष्य ही 'शरव्या' है । यह लक्ष्य बड़ा सोच-समझकर बनाया जाए - यह 'ब्रह्मसंशित' ज्ञान से तीव्र किया हुआ हो । मन्त्र में कहते हैं कि (ब्रह्मसंशिते) = ज्ञान से तीव्र (शरव्ये) = हे लक्ष्य ! तू (अवसृष्टा) =[अवसृज्=to make, to create] हमारे जीवनों में उत्पन्न होकर (परापत) = खूब दूर बढ़ चल । लक्ष्य के सदा सामने होने पर हमारी तीव्रगति व ‘शीघ्र प्रगति' क्यों न होगी? उन्नति का अभाव तो तभी तक था जब तक कोई लक्ष्य नहीं था। लक्ष्य का न होना व लक्ष्य का भूला हुआ होना दोनों एक ही परिणाम को पैदा करते हैं।
- ‘हमारा लक्ष्य क्या हो ?' इसका थोड़ा-सा संकेत मन्त्र के उत्तरार्ध में इस प्रकार है कि (गच्छ) = तू जा (अमित्रान्) = स्नेह न करने की भावना को – ईर्ष्या - द्वेषादि की भावना को – [अमित्र दुर्हद ] - औरों से जलने की भावना को तू (प्रपद्यस्व) = विशेषरूप से आक्रान्त कर [पद गतौ, क्रम-गतौ] । (अमीषाम्) = इन द्वेषादि की निकृष्ट भावनाओं में से (कंचन) = किसी को (मा उच्छिष:) = शेष मत छोड़ । तू इन भावनाओं में से एक-एक को ढूँढकर समाप्त कर दे । जो मनुष्य प्रतिदिन आत्मालोचन करता है वह अपने अन्दर छिपे रूप में रहनेवाली इन बुरी भावनाओं को समाप्त करने में समर्थ होता है।
भावार्थ -
हमारा जीवन निरुद्देश्य न हो। हम दुर्हदता की भावना को समूल नष्ट कर दें ।
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