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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 2
ऋषिः - भरद्वाजो बार्हस्पत्यः
देवता - अग्निः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम - आग्नेयं काण्डम्
15
त्व꣡म꣢ग्ने य꣣ज्ञा꣢ना꣣ꣳ हो꣢ता꣣ वि꣡श्वे꣢षाꣳ हि꣣तः꣢ । दे꣣वे꣢भि꣣र्मा꣡नु꣢षे꣣ ज꣡ने꣢ ॥२॥
स्वर सहित पद पाठत्व꣢म् । अ꣣ग्ने । यज्ञा꣡ना꣢म् । हो꣡ता꣢꣯ । वि꣡श्वे꣢꣯षाम् । हि꣣तः꣢ । दे꣣वे꣡भिः꣢ । मा꣡नु꣢꣯षे । ज꣡ने꣢꣯ ॥२॥
स्वर रहित मन्त्र
त्वमग्ने यज्ञानाꣳ होता विश्वेषाꣳ हितः । देवेभिर्मानुषे जने ॥२॥
स्वर रहित पद पाठ
त्वम् । अग्ने । यज्ञानाम् । होता । विश्वेषाम् । हितः । देवेभिः । मानुषे । जने ॥२॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 2
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 1; मन्त्र » 2
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 1;
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(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 1; मन्त्र » 2
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 1;
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विषय - करनेवाला वह प्रभु है
पदार्थ -
१. हे अग्ने= आगे और आगे ले-चलनेवाले प्रभो ! त्वम् = आप विश्वेषाम् = सब यज्ञानाम्= श्रेष्ठतम कर्मों के होता= सम्पादक हैं। जीव के द्वारा होते हुए सब शुभ कर्म उस प्रभु की दी हुई शक्ति से ही हो रहे हैं। जब जीव अल्पज्ञता के कारण उस शक्ति का ठीक प्रयोग नहीं करता तभी अशुभ कर्म हो जाते हैं और इनका उत्तरदायी वह जीव ही होता है।
२. आप देवेभिः=दिव्य गुणों के द्वारा मानुषे जने-मानवता [मननशीलता] से युक्त मनुष्य में हितः = प्रतिष्ठित होते हैं। सर्वव्यापक होते हुए भी प्रभु का निवासस्थान मानवता से युक्त मनुष्य ही है, अर्थात् हम अपने अन्दर दिव्य गुणों की वृद्धि करके ही उस प्रभु का साक्षात्कार कर सकते हैं और तभी इस मन्त्र के ऋषि 'भरद्वाज' = शक्तिसम्पन्न बन सकते हैं।
भावार्थ -
भावार्थ–संसार में सब उत्तम कर्म प्रभु की शक्ति से होते हैं। मनुष्य को उसका साक्षात्कार दिव्य गुणों के धारण करने से होता है।
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