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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 31
ऋषिः - प्रस्कण्वः काण्वः
देवता - अग्निः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम - आग्नेयं काण्डम्
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उ꣢दु꣣ त्यं꣢ जा꣣त꣡वे꣢दसं दे꣣वं꣡ व꣢हन्ति के꣣त꣡वः꣢ । दृ꣣शे꣡ विश्वा꣢꣯य꣣ सू꣡र्य꣢म् ॥३१॥
स्वर सहित पद पाठउ꣢त् । उ꣣ । त्य꣢म् । जा꣣त꣡वे꣢दसम् । जा꣣त꣢ । वे꣣दसम् । देव꣢म् । व꣣हन्ति । केत꣡वः꣢ । दृ꣣शे꣢ । वि꣡श्वा꣢꣯य । सू꣡र्य꣢꣯म् ॥३१॥
स्वर रहित मन्त्र
उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः । दृशे विश्वाय सूर्यम् ॥३१॥
स्वर रहित पद पाठ
उत् । उ । त्यम् । जातवेदसम् । जात । वेदसम् । देवम् । वहन्ति । केतवः । दृशे । विश्वाय । सूर्यम् ॥३१॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 31
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 3; मन्त्र » 11
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 3;
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(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 3; मन्त्र » 11
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 3;
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विषय - दर्शन
पदार्थ -
पिछले मन्त्र में समर्पण का विषय चल रहा था। समर्पण उसी के प्रति होता है जिसे हम देख पाते हैं। अनदिखे के प्रति अर्पण क्या! जीव को भी प्रभु दिखेंगे तभी तो उनके प्रति अर्पण करेगा, अतः समर्पण के बाद दर्शन का विषय आता है।
(उत् उ)= ऊपर उठकर ही । जब तक जीव प्राकृतिक भोगों में उलझा हुआ है तब तक तो प्रभु-दर्शन कर ही नहीं सकता। जिस दिन हम प्रकृति की उलझनों से (उत्) = out=बाहर निकल जाएँगे उसी दिन (त्यम्)= उस दूर से दूर - सर्वत्र विद्यमान (जातवेदसम्)= प्रत्येक पदार्थ में विद्यमान (देवम् )= ज्ञानाग्नि से दीप्त [ देवो दीपनात्] (सूर्यम्)= सबको प्रकाशित करनेवाले उस प्रभु को (केतव:)=ज्ञानी, विचारशील [कित ज्ञाने] होकर ही (वहन्ति)= धारण करेंगे।
परमेश्वर की सत्ता हमारे हृदयों में है, परन्तु ज्ञान के अभाव में उसकी सत्ता हमारे लिए न होने के ही समान है। विचारशील बनने पर ज्ञानी प्रभु को अपने अन्दर धारण करते हैं, परन्तु प्रभु का दर्शन कर ये उस अद्भुत रस में ही निमग्न नहीं हो जाते, अपितु विश्वाय दृशे =[सर्वेषां दर्शनाय] जगद्रूपी जङ्गल में भटकते हुए अन्य जीवों को भी वे उस प्रभु का दर्शन कराने का प्रयत्न करते हैं। इस प्रकार ब्रह्मानन्द की प्राप्ति करके भी वे स्वार्थी नहीं बन जाते। इनका जीवन ही यह प्रमाणित करता है कि ये स्वार्थ की गन्ध से दूर हैं, परिणामतः मूर्खता से भी दूर हैं। ये वस्तुतः मेधावी हैं, इस मन्त्र के ऋषि ‘प्रस्कण्व' बनने के योग्य हैं।
भावार्थ -
ज्ञानी चिन्तन करके, प्रकृति की उलझनों से ऊपर उठ, प्रभु का दर्शन करते हैं और अन्य मनुष्यों को भी उसका दर्शन कराने का प्रयत्न करते हैं।
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