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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 450
ऋषिः - बन्धुः सुबन्धुः श्रुतबन्धुर्विप्रबन्धुश्च क्रमेण गोपायना लौपायना वा देवता - इन्द्रः छन्दः - द्विपदा गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम - ऐन्द्रं काण्डम्
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वि꣡श्व꣢स्य꣣ प्र꣡ स्तो꣢भ पु꣣रो꣢ वा꣣ स꣡न्यदि꣢꣯ वे꣣ह꣢ नू꣣न꣢म् ॥४५०

स्वर सहित पद पाठ

वि꣡श्व꣢꣯स्य । प्र । स्तो꣢भ । पुरः꣢ । वा꣣ । स꣢न् । य꣡दि꣢꣯ । वा꣣ । इह꣢ । नू꣣न꣢म् ॥४५०॥


स्वर रहित मन्त्र

विश्वस्य प्र स्तोभ पुरो वा सन्यदि वेह नूनम् ॥४५०


स्वर रहित पद पाठ

विश्वस्य । प्र । स्तोभ । पुरः । वा । सन् । यदि । वा । इह । नूनम् ॥४५०॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 450
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 2; मन्त्र » 4
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 4; खण्ड » 11;
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पदार्थ -

प्रभु की उपासना से दीप्त मस्तिष्कवाला सुबन्धु ' श्रुतबन्धु' बन गया है - ज्ञान का मित्र। इस ज्ञान के बढ़ने का यह स्वाभाविक परिणाम है कि उसके जीवन में वासनाओं का क्षय हो जाए। वस्तुतः यह वासनाओं का विनाश भी प्रभुकृपा से ही होता है। यह श्रुतबन्धु प्रभु की उपासना करता हुआ कहता है कि हे प्रभो! आप ही (विश्वस्य) = [विशु = to enter] हमारे न चाहते हुए भी हमारे अन्दर प्रविष्ट हो जानेवाली इन आसुर भावनाओं के (प्रस्तोभ) = रोकनेवाले हैं। । [स्तुभ् = to stop ] । (पुरो वासन्) = यदि आप मेरे हृदयान्तरिक्ष में पहले ही मृत्यु - क्षण से बहुत पूर्व ही-स्थापित हुए, तब तो आप मेरी इन वासनाओं को नष्ट करके मेरे जीवन में शान्ति प्राप्त कराते ही हो। (यदि वेह नूनम्) = पर यदि 'इह' =यहाँ मृत्यु क्षण में भी हृदय में प्रतिष्ठित किये जाते हो तो भी नूनम् - निश्चय से आप मेरी वासनाओं की समाप्ति के कारण बनते हो । कितना सौभाग्यशाली वह व्यक्ति है जोकि जीवन के यौवन में ही प्रभु को हृदय में प्रतिष्ठित करके सब वासनाओं के लिए उस हृदयद्वार को बन्द कर देता है, परन्तु वह भी भाग्यशाली ही है जोकि अन्तिम अवस्था वह भी भाग्यशाली ही है जोकि अन्तिम अवस्था में भी ऐसा करने में समर्थ हो जाता है।

भावार्थ -

प्रभुकृपा से मैं अवसान से बहुत पहले ही हृदयद्वार को वासनाओं के लिए

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