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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 470
ऋषिः - अहमीयुराङ्गिरसः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम - पावमानं काण्डम्
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य꣢स्ते꣣ म꣢दो꣣ व꣡रे꣢ण्य꣣स्ते꣡ना꣢ पव꣣स्वा꣡न्ध꣢सा । दे꣣वावी꣡र꣢घशꣳस꣣हा꣢ ॥४७०॥
स्वर सहित पद पाठयः꣢ । ते꣣ । म꣡दः꣢꣯ । व꣡रे꣢꣯ण्यः । ते꣡न꣢꣯ । प꣣वस्व । अ꣡न्ध꣢꣯सा । दे꣣वावीः꣢ । दे꣣व । अवीः꣢ । अ꣣घशँसहा꣢ । अ꣢घशँस । हा꣢ ॥४७०॥
स्वर रहित मन्त्र
यस्ते मदो वरेण्यस्तेना पवस्वान्धसा । देवावीरघशꣳसहा ॥४७०॥
स्वर रहित पद पाठ
यः । ते । मदः । वरेण्यः । तेन । पवस्व । अन्धसा । देवावीः । देव । अवीः । अघशँसहा । अघशँस । हा ॥४७०॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 470
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 4; मन्त्र » 4
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 1;
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(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 4; मन्त्र » 4
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 1;
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विषय - वरेण्य-मद
पदार्थ -
इस संसार में कितने ही 'मद' है। धन का मद है - जो धतूरे के मद से भी कहीं बढ़कर है। बल का भी मद होता है - एक पहलवान कुछ इतराता हुआ सा चलता है। कई बार योग साधना करते हुए तपस्वी को अपने तप की शक्ति का भी मद हो जाता है। कईयों में विद्या का मद देखा जाता है, ये सब हेय हैं— इनका परिगणन 'काम-क्रोध; लोभ-मोह, मद-मत्सर, इन छह शत्रुओं में है। शत्रु होने से ये मद त्याज्य है, परन्तु प्रभु ने अन्धसा=अधिक-से-अधिक ध्यान देने योग्य [आध्यायनीय] सोम के द्वारा भी एक मद हमारे में उत्पन्न किया है। इस सोम द्वारा भी एक मद हमारे में उत्पन्न किया है। इस सोम के सुरक्षित होने पर इसका अनुभव होता है। प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि ‘अहमीयु' = प्राकृतिक भोगों की कामना न करनेवाला 'आङ्गिरस'= शक्तिशाली व्यक्ति प्रभु से प्रार्थना करता है कि (यः) = जो (ते) = तेरा (अन्धसा) = सोम के द्वारा उत्पन्न (वरेण्यः मदः) = वरणीय श्रेष्ठ मद है (तेन) उससे (आपवस्व) = हमारे जीवनों को पवित्र कीजिए । यह सोमजनित उल्लास (देवावी:) = [देव-आवी] हमें सब प्रकार से दिव्यता की ओर ले-चलनेवाला है। इससे हमारे में दिव्यता का उत्तरोत्तर विकास होता है और यह सोम (अघशंसहा) = पाप के नाम को भी नष्ट करनेवाला है- इससे हमारे अन्दर पाप का नामवषेश भी नहीं रहता। हमारा जीवन सचमुच पवित्र व दिव्य बन जाता है।
भावार्थ -
सोमजनित 'मद' सचमुच वरणीय है। १. यह हमारे अन्दर दिव्यता को बढ़ाता है और २. पाप को नाममात्र भी बचे नहीं रहने देता।