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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 478
ऋषिः - त्रित आप्त्यः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम - पावमानं काण्डम्
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प्र꣡ सोमा꣢꣯सो विप꣣श्चि꣢तो꣣ऽपो꣡ न꣢यन्त ऊ꣣र्म꣡यः꣢ । व꣡ना꣢नि महि꣣षा꣡ इ꣢व ॥४७८॥
स्वर सहित पद पाठप्र꣢ । सो꣡मा꣢꣯सः । वि꣣पश्चि꣡तः꣢ । वि꣣पः । चि꣡तः꣢꣯ । अ꣣पः꣢ । न꣣यन्ते । ऊर्म꣡यः꣢ । व꣡ना꣢꣯नि । म꣣हिषाः꣢ । इ꣣व ॥४७८॥
स्वर रहित मन्त्र
प्र सोमासो विपश्चितोऽपो नयन्त ऊर्मयः । वनानि महिषा इव ॥४७८॥
स्वर रहित पद पाठ
प्र । सोमासः । विपश्चितः । विपः । चितः । अपः । नयन्ते । ऊर्मयः । वनानि । महिषाः । इव ॥४७८॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 478
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 5; मन्त्र » 2
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 2;
Acknowledgment
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 5; मन्त्र » 2
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 2;
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विषय - ज्ञान-कर्म-उपासना
पदार्थ -
सोम के संयम से मैं 'विपश्चित्' बनता हूँ। ‘वि-पश् - चित्’- विशेषरूप से सूक्ष्मता के साथ देखकर मैं प्रत्येक पदार्थ का चिन्तन करनेवाला बनता हूँ। इससे मन्त्र में कार्य-कारण का अभेद करते हुए सोम को ही विपश्चित् कहा गया है। (सोमासः) = ये सोम (प्र) = खूब (विपश्चित:) = ज्ञानी हैं या मुझे ज्ञानी बनानेवाले हैं। (ऊर्मयः) = हमारे अन्दर उत्साह की तरङ्गों को भरनेवाले ये सोम (अपो नयन्त) = हमें कर्मों को प्राप्त कराते हैं, अर्थात् सोम के द्वारा मेरा जीवन प्रकाशमय होता है और मैं बड़े उत्साह से कर्मों में लोकसंग्रह के कार्यों में प्रवृत्त होता हूँ। ज्ञानी बनकर कर्मशील होता हूँ। एवं ज्ञानपूर्वक होने से ही मेरे ये कर्म पवित्र होते हैं। इन पवित्र कर्मों के द्वारा ही तो मुझे प्रभु की उपासना करनी है। (महिषा इव) = [मह पूजायाम् ] प्रभु की पूजा करनेवालों के समान ये सोम मुझे (वनानि) = [वन संभक्ति] संभजनों व उपासनाओं को (नयन्त) = प्राप्त कराते हैं, मेरा जीवन इन पवित्र कर्मों को प्रभु चरणों में निवेदित करता हुआ उपासनामय बनता है।
सोम के द्वारा ‘ज्ञान-कर्म-उपासना' इन तीनों का ही विस्तार करने से ये 'त्रित' है। प्रभु को प्राप्त करने से ‘आपत्य' है। ('ज्ञानपूर्वक कर्म') = करने से उपासना तो स्वतः ही हो जाती है, अतः यह ज्ञान और कर्म का विस्तार करनेवाला 'द्वित' भी कहलाता है और ज्ञान का विस्तार इसको क्रियावान् बना ही देता है, अतः ज्ञान का विस्तार करनेवाला यह ‘एकत' नामवाला हो जाता है। ‘एकत' का ही विस्तार 'द्वि-त' है' और 'द्वित' का 'त्रित'। एवं यह त्रित अपने को प्रभु - प्राप्ति के योग्य बनाता हैं।
भावार्थ -
मैं सोमी बनूँ। सोम मुझे ज्ञान-कर्म-उपासना का विस्तार करनेवाला बनाकर ‘त्रित-आप्त्य' बनाएँ
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