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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 510
ऋषिः - अमहीयुराङ्गिरसः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम - पावमानं काण्डम्
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अ꣣पघ्न꣡न्प꣢वते꣣ मृ꣢꣫धोऽप꣣ सो꣢मो꣣ अ꣡रा꣢व्णः । ग꣢च्छ꣣न्नि꣡न्द्र꣢स्य नि꣣ष्कृ꣢तम् ॥५१०॥
स्वर सहित पद पाठअ꣣पघ्न꣢न् । अ꣣प । घ्न꣢न् । प꣣वते । मृ꣡धः꣢꣯ । अ꣡प꣢꣯ । सो꣡मः꣢꣯ । अ꣡रा꣢꣯व्णः । अ । रा꣣व्णः । ग꣡च्छ꣢꣯न् । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । नि꣣ष्कृत꣢म् । निः꣣ । कृत꣢म् ॥५१०॥
स्वर रहित मन्त्र
अपघ्नन्पवते मृधोऽप सोमो अराव्णः । गच्छन्निन्द्रस्य निष्कृतम् ॥५१०॥
स्वर रहित पद पाठ
अपघ्नन् । अप । घ्नन् । पवते । मृधः । अप । सोमः । अराव्णः । अ । राव्णः । गच्छन् । इन्द्रस्य । निष्कृतम् । निः । कृतम् ॥५१०॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 510
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 2; मन्त्र » 14
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 4;
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(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 2; मन्त्र » 14
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 4;
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विषय - अन् - ऋणता [ Repayment of the debt ]
पदार्थ -
यह (सोमः) = सोम हमारे जीवनों में (पवते) = प्रवाहित होता है। क्या करता हुआ? १. (मृधः अपघ्नन्) = [murderer = मृधर्] को दूर नष्ट करता हुआ। सोम के संयम से मानव जीवन से 'काम-क्रोध-लोभ' दूर हो जाते हैं। ये मनुष्य के सर्वमहान् शत्रु हैं। ये उसका हिंसन करनेवाले हैं। उसकी आत्मा का हनन करनेवाले हैं। यह सोम (अराव्णः) = [दा दाने] न देने की वृत्तियों को (अप) = दूर करता है। सोम का संयम मनुष्य को उदार बनाता है - इसके जीवन में कृपणता को स्थान नहीं मिलता। 4
इस प्रकार कामादि का संहार तथा आदानवृत्ति के परिहार से यह जीव (इन्द्रस्य) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु के (निष्कृतम्) = आनृण्य को (गच्छन्) = जाता है। प्रभु के अनन्त उपकार हैं, उन उपकारों की अनृण होने का प्रकार एक ही है कि हम लोभादि से बचें और प्रभु से दिये धन को लोकहित में विनियुक्त करें- प्रभु ने वस्तुतः धन दिया ही इसीलिए है - उसका प्रभु की इच्छानुसार विनियोग ही प्रभु की उपासना है - यही प्रभु के उपकारों का प्रत्युपकार है। प्रभु पूर्ण हैं; मैं भी प्रभु के प्राणियों की यत्किञ्चित् पूर्णता के लिए प्रभु से दी हुई शक्तियों का प्रयोग करूँ। स्वयं भोगों में न फँस जाऊँ–'अ-मही-यु'-पार्थिव भोगों के प्रति अनासक्त बनूँ। इससे मैं ‘आङ्गिरस'= शक्तिशाली भी तो बन पाऊँगा।
भावार्थ -
हम प्राणियों की सेवा करके प्रभु के ऋण से अनृण होने का प्रयत्न करें।
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