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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 623
ऋषिः - वामदेवो गौतमः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - अनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
काण्ड नाम - आरण्यं काण्डम्
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ह꣡री꣢ त इन्द्र꣣ श्म꣡श्रू꣢ण्यु꣣तो꣡ ते꣢ ह꣣रि꣢तौ꣣ ह꣡री꣢ । तं꣡ त्वा꣢ स्तुवन्ति क꣣व꣡यः꣢ पु꣣रु꣡षा꣢सो व꣣न꣡र्ग꣢वः ॥६२३
स्वर सहित पद पाठह꣡री꣢꣯ । ते꣣ । इन्द्र । श्म꣡श्रू꣢꣯णि । उ꣣त꣢ । उ꣣ । ते । हरि꣡तौ꣢ । हरी꣣इ꣡ति꣢ । तम् । त्वा꣣ । स्तुवन्ति । कव꣡यः꣢ । प꣣रुषा꣡सः꣢ । व꣣न꣡र्ग꣢वः ॥६२३॥
स्वर रहित मन्त्र
हरी त इन्द्र श्मश्रूण्युतो ते हरितौ हरी । तं त्वा स्तुवन्ति कवयः पुरुषासो वनर्गवः ॥६२३
स्वर रहित पद पाठ
हरी । ते । इन्द्र । श्मश्रूणि । उत । उ । ते । हरितौ । हरीइति । तम् । त्वा । स्तुवन्ति । कवयः । परुषासः । वनर्गवः ॥६२३॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 623
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » 4; मन्त्र » 9
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 4;
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(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » 4; मन्त्र » 9
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 4;
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विषय - कौन स्तुति करते है ?
पदार्थ -
हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशाली प्रभो! (हरी) = मेरी ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ (ते) = तेरे (श्मश्रूणी) = [श्म= शरीर, श्रि=आश्रय करना] शरीर में आश्रय करनेवाली हैं। इन्द्रियाँ 'हरी' कहलाती हैं, क्योंकि ये मनुष्यों का हरण करनेवाली हैं - उन्हें इधर-उधर भटकानेवाली हैं और वश में होने पर ये अज्ञान व कष्टों का हरण - निवारण करनेवाली हैं। भक्त प्रयत्न करता है कि उसकी इन्द्रियाँ प्रभु में ही निवास करें, इधर-उधर न भटकें। यह भक्त कहता है कि (उत उ) = और निश्चय से (हरी) = ये मेरी इन्द्रियाँ (ते हरितौ) = मुझे तेरी ओर ले चलनेवाली हैं। वस्तुतः सारी साधना यही है कि हम इन्द्रियों को विषयों से हटाकर उस प्रभु में स्थिर करने का प्रयत्न करें।
ये भक्त (त्वाम्) = आपकी (स्तुवन्ति) = स्तुति करते हैं। कौन
१. (कवयः) = जो क्रान्तदर्शी हैं- वस्तुओं के असली स्वरूप को देखने का प्रयत्न करते हैं। ये गहराई तक जाकर वस्तु के तत्त्व को जानते हैं और उसका ठीक प्रयोग करते हैं। वस्तुओं का ठीक प्रयोग भी उस प्रभु का स्तवन व आदर ही है।
२. (पुरुषासः) = प्रभु का स्तवन वे करते हैं जो पुरुष हैं – जिनमें 'पौरुष' है। प्रभु का भक्त कभी अकर्मण्य नहीं होता। भक्ततम वे ही हैं जो ‘सर्वभूतहिते रतः' हैं। प्रभु का हममें निवास 'पौरुष' के ही रूप में है। यदि मुझमें पौरुष नहीं तो प्रभु का भक्त क्या?
३. (वनर्गव:) = [वन=संभक्ति=संविभाग, गावः = इन्द्रियाणि] - प्रभुभक्त वे हैं जिनकी इन्द्रियाँ संविभाग का पाठ पढ़ती हैं। वे व्यक्ति जो संविभागपूर्वक खाते हैं, केवल अपने लिए नहीं पकाते-प्रभु के भक्त हैं। सारा संसार ही प्रभुभक्त का कुटुम्ब होता है। ऐसी स्थिति में वह संविभागपूर्वक क्यों न खाएगा?
एवं, प्रभुभक्त क्रान्तदर्शी होता हुआ, वस्तुओं को ठीक रूप में देखता हुआ सदा पौरुषमय जीवनवाला होता है और पौरुष-प्राप्त सम्पत्ति का संविभागपूर्वक सेवन करता है। यह व्यक्ति ‘वामदेव'=सुन्दर दिव्य गुणोंवाला होता है और 'गोतम' प्रशस्तेन्द्रियोंवाला बनता है।
भावार्थ -
भावार्थ- मैं कवि, पुरुष व वनर्गु बनकर प्रभुभक्त बनूँ।